Jan Gan Man: चुनाव करीब देख नेता मुफ्त में बांटे जाने वाले सामान की लिस्ट बना रहे हैं, क्या यह देशहित में है?

देश में लोकसभा चुनावों में अब एक साल से भी कम का समय बचा है। ऐसे में सभी राजनीतिक दल चुनावों की तो तैयारी कर ही रहे हैं साथ ही उन सामानों की लिस्ट भी तैयार कर रहे हैं जिनको मुफ्त में देने की घोषणा कर मतदाताओं को लुभाया जायेगा। यह स्थिति तब है जब देश के सभी राज्यों पर ही नहीं बल्कि केंद्र सरकार पर भी हजारों करोड़ रुपए का कर्ज है। हम दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जरूर हैं लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि हम कर्ज में भी डूबे हुए हैं। देश पर कर्ज यानि हर नागरिक पर कर्ज। देखा जाये तो राजनीतिक दल जो चीजें मुफ्त में देने का ऐलान करते हैं वह हमें हासिल करने में तो बड़ा आनंद आता है लेकिन हम यह नहीं समझते कि उसके चलते हम पर और कर्ज बढ़ता जा रहा है। यदि मुफ्तखोरी पर लगाम नहीं लगी तो हमारा हाल श्रीलंका और पाकिस्तान जैसा होते देर नहीं लगेगी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कहते हैं कि उनकी सरकार ने यह साबित करके दिखाया है कि कैसे जनता का बिजली और पानी का बिल माफ किया जाता है लेकिन केजरीवाल ने कभी यह नहीं बताया कि दिल्ली पर कर्ज बढ़कर 55 हजार करोड़ रुपए हो गया है। वह तो भला हो भारत के पीआईएल मैन अश्विनी उपाध्याय का जो इस मुद्दे पर देश में अलख जगाने में जुटे हुए हैं और उनके ही प्रयासों से भारत के प्रधान न्यायाधीश इस मुद्दे पर सुनवाई के लिए तीन जजों की पीठ का गठन करने पर सहमत हो गये हैं। उम्मीद है कि जल्द ही इस मामले की सुनवाई शुरू होगी और यह मुद्दा तार्किक निष्कर्ष तक पहुँचेगा।देखा जाये तो प्रधानमंत्री एक ओर देश को आत्मनिर्भर बनाने की बात कर रहे हैं तो दूसरी ओर कुछ राजनीतिक दल देश को मुफ्तखोर बनाने पर तुले हैं। ऐसे लोगों का षड्यंत्र जब तक हमें समझ आयेगा तब तक बहुत देर हो चुकी होगी इसलिए हर भारतीय को मुफ्तखोरी की राजनीति के विरुद्ध तत्काल खड़े होने की जरूरत है। आजकल एक और चलन देखने को मिल रहा है। सिर्फ चुनावों के समय ही मुफ्त उपहारों की घोषणा होती हो ऐसा नहीं है, अब तो सरकारें बजट में भी ऐसे ऐलान करने लगी हैं। समय आ गया है कि कल्याणकारी और मुफ्तखोरी की योजना के बीच अंतर को स्पष्टता के साथ परिभाषित किया जाये ताकि राजनीतिक दल अर्थव्यवस्था को नुकसान ना पहुँचा पायें। उचित सब्सिडी और मुफ्त की रेवड़ियों के बीच अंतर करना बहुत जरूरी हो गया है। अगर राज्यों ने राजकोषीय घाटे को कम करने, राजस्व घाटे को खत्म करने और बकाया ऋण को स्वीकार्य स्तर पर रखने के लिए विवेकपूर्ण उपाय नहीं किये तो हालात विकट हो जाएंगे।इसे भी पढ़ें: Jan Gan Man: पत्थरबाजी की घटनाएं देशभर में देखने को मिल रही हैं, आखिर इस समस्या का पक्का इलाज क्या है?यहां सवाल यह भी उठता है कि यदि राजनीतिक दल हर चीज लोगों को मुफ्त में ही देना चाहते हैं तो उन्हें इसकी याद चुनावों के समय ही क्यों आती है? सवाल यह भी उठता है कि सरकारें क्या जानबूझकर गरीब को गरीब ही बनाये रखना चाहती हैं क्योंकि यदि लोग समर्थ बन गये तो उनका राजनीतिक हित नहीं सध पायेगा? सवाल यह भी उठता है कि करदाताओं के पैसे से मुफ्त उपहार बांटने की घोषणा करने वाले नेता क्या कभी इस मुद्दे पर करदाताओं का मन जानने की कोशिश करते हैं?प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी बार-बार कहते रहे हैं कि रेवड़ी संस्कृति विकास की राह में अवरोध है। प्रधानमंत्री ने ‘शॉर्टकट’ बताकर इसके खतरे से आगाह करते हुए मुफ्त संस्कृति पर बहस को आगे भी बढ़ाया था। लेकिन उनके विरोध में एक साथ वह नेता और मुख्यमंत्री खड़े हो गये थे जिनका राजनीतिक वजूद ही मुफ्त उपहारों की राजनीति पर आधारित है। बहरहाल, अब उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय के प्रयासों से इस मामले में तीन सदस्यीय पीठ गठित होने से उम्मीद जगी है कि जल्द ही देश को राजनीति में तेजी से पनपती इस कुसंस्कृति से निजात मिलेगी।