‘हर रोज बेटे की मौत की दुआ मांगना आसान नहीं…’, 11 साल से जिंदा लाश है बेटा, रुला देगी इस मां-बाप की कहानी

नई दिल्ली : अपने ही जिगर के टुकड़े की मौत की दुआ! सही पढ़ा आपने, बददुआ नहीं, बेटे की मौत की दुआ। सोचिए, वे माता-पिता कितने अभागे होंगे जिन्हें अपने ही बेटे की मौत की कामना करनी पड़ रही है। ‘हर रोज बेटे की मौत की दुआ मांगना आसान नहीं है, लेकिन हमारे पास कोई रास्ता भी तो नहीं है। उसका दर्द और तड़पना अंतहीन है…।’ ये कहते हुए अशोक राणा बिलख पड़ते हैं। उनके बेटे हरीश 11 वर्ष से बिस्तर पर पड़े हैं। एक जिंदा लाश की तरह। एक मनहूस दिन वह अपनी पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए। इलाज के लिए घर तक बेच दिया। लेकिन हालत जस की तस। मां-बाप से अपने जिगर के टुकड़े की पीड़ा, तड़प, दर्द देखा नहीं जा रहा। अशोक राणा और उनकी पत्नी ने दिल्ली हाई कोर्ट से गुहार लगाई थी कि उनके बेटे को निष्क्रिय इच्छा मृत्यु या यूं कहे कि दया मृत्यु की इजाजत दी जाए। लेकिन हाई कोर्ट ने उनकी याचिका को ठुकरा दिया। जब माता-पिता अपने बच्चे की मौत की कामना करते हैं, तो यह क्रूरता नहीं बल्कि प्यार का तकाजा होता है। ऐसा प्रेम जो बच्चे के दुख को सहन नहीं कर सकता। यही कारण है कि अशोक राणा और उनकी पत्नी ने अदालत में जाकर अनुरोध किया कि उनके बेटे हरीश को अपना जीवन समाप्त करने की अनुमति दी जाए। 62 वर्ष के राणा कहते हैं, ‘अपने बच्चे की मौत की गुहार लगाना आसान नहीं है। लेकिन हमारे पास कोई विकल्प नहीं है क्योंकि उसका दर्द और पीड़ा अंतहीन है। वह एक दशक से अधिक समय से एक तरह से निर्जीव सी अवस्था में पड़ा हुआ है और हम हमेशा उसकी देखभाल करने के लिए वहां नहीं रहेंगे।’ उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर पैसिव यूथेंसिया यानी निष्क्रिय इच्छा मृत्यु के अनुरोध का आकलन करने के लिए एक मेडिकल बोर्ड के गठन की मांग की थी। हाई कोर्ट ने 8 जुलाई को याचिका खारिज कर दी।हरीश सिर्फ कहने को जिंदा हैं। सांसें चल रही हैं लेकिन 11 साल से जिंदा लाश की तरह है। 2013 से ही वह बिस्तर पर हैं। उनके बेड के पास ऊपर यूरिन बैग लटक रहा है। एक पाइप उनके पेट से जुड़ी है जिसके जरिए उन्हें खाना दिया जाता है। हरीश की हालत ऐसी है कि वह जीते-जागते कंकाल में तब्दील हो चुके हैं।हालात हमेशा ऐसे नहीं थे। हरीश चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी, मोहाली में सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। वह आम नौजवानों की तरह ही जीवन जी रहे थे। 2013 में एक मनसूहस दिन सब कुछ बदल गया जब वह अपने पेइंग गेस्ट आवास की चौथी मंजिल से गिर गए। उनके सिर में गंभीर चोटें आईं। साहिबजादा अजीत सिंह नगर जिले के खरड़ में एफआईआर दर्ज कराने के बाद परिवार ने हादसे के पहले दिन से ही अलग-अलग अस्पतालों में उनका बेहतरीन इलाज करवाया। ये आस रहती थी कि शायद चमत्कार हो जाए और उनका हरीश ठीक हो जाए। हरीश को पीजीआई चंडीगढ़ के अलावा दिल्ली के एम्स, राम मनोहर लोहिया, लोक नायक और फोर्टिस अस्पताल में इलाज चला, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।राज सैट एयर कैटरिंग लिमिटेड में काम करने वाले राणा ने बताया, ‘हमने एक साल तक हरीश की देखभाल के लिए 27,000 रुपये प्रति महीने के हिसाब से एक नर्स को रखा था। यह रकम उस समय मेरे 28,000 रुपये के मासिक वेतन के लगभग बराबर थी।’ राणा आगे कहते हैं, ‘इसके अलावा, हमें एक फिजियोथेरेपिस्ट के लिए 14,000 रुपये देने पड़े। खर्च वहन करने लायक नहीं थे, इसलिए हमें सेवाएं बंद करनी पड़ीं और मजबूरन हमने खुद ही देखभाल करने का विकल्प चुना।’फिलहाल, हरीश का हर महीने का मेडिकल खर्च 20,000-25,000 रुपये है, जिसमें दवाइयां, खाना और बेडसोर के इलाज जैसी दूसरी जरूरी चीजें शामिल हैं। राणा कहते हैं, ‘सरकार से कोई मदद नहीं मिल रही है और हम उसके मेडिकल खर्च को वहन नहीं कर सकते। हम ही जानते हैं कि हम कैसे काम चला रहे हैं।’ हालांकि, हरीश के अस्पताल में भर्ती होने पर परिवार को एक बार केंद्र सरकार की योजना से 50,000 रुपये की आर्थिक मदद मिली थी।वह कहते हैं, ‘हम कुछ अन्य लोगों की जिंदगी बचाने के लिए उसके अंग दान करेंगे। हमें यह जानकर सांत्वना मिलेगी कि वह किसी और के शरीर में एक सही जीवन जी रहा है।’सितंबर 2021 में, राणा परिवार ने दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के महावीर एन्क्लेव में अपने तीन मंजिला घर को बेचने का कठिन फैसला लिया। वह कहते हैं, ‘हम 1988 से इस जगह को अपना घर कहते थे, इसकी दीवारों के भीतर अनगिनत यादें संजोते थे। हालांकि, हमारे घर तक एम्बुलेंस सेवाओं की पहुंच न होने के कारण हमें इसे छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।’ राणा को हर महीने सिर्फ 3,500 रुपये पेंशन मिलती है। इलाज का खर्च उठाने के लिए वह वीकेंड पर सैंडविच वगैरह बेचते हैं। छोटे बेटे की सैलरी से घर खर्च चलाने की कोशिश करते हैं। राणा कहते हैं, ‘इनकम को बढ़ाने के लिए मैं वीकेंड में स्थानीय मैदान पर खेल गतिविधियों में भाग लेने वाले बच्चों के लिए स्प्राउट्स और सैंडविच तैयार करता हूं। हाल ही में मेरे छोटे बेटे आशीष को निजी क्षेत्र में नौकरी मिल गई है। नतीजतन, उसने हमारे घर के खर्चों को संभालने की जिम्मेदारी ले ली है।’हरीश की मां निर्मला देवी (55) बेड पर पड़े अपने बेटे की देखभाल करती हैं लेकिन बढ़ती उम्र की वजह से उन्हें काफी दिक्कतें आती हैं। हरीश सिर्फ कहने के लिए जिंदा हैं। वह अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर हैं। उन्हें केवल फीडिंग ट्यूब के जरिए ही खाना खिलाया जा सकता है।