क्या कांग्रेस के नए मनमोहन सिंह बनने जा रहे हैं रघुराम राजन? राहुल के साथ खड़े होने का मतलब समझ‍िए

नई दिल्ली : भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पूर्व गवर्नर और जाने-माने अर्थशास्त्री रघुराम राजन (Raghuram Rajan) इस समय सुर्खियों में हैं। राजन ने बुधवार को राजस्थान में कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा (Bharat Jodo Yatra) में हिस्सा लिया। वे राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के साथ कदमताल कर रहे थे। इसके साथ ही राजन की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के बारे में कयासों को हवा मिल गई है। राजनीतिक गलियारों और सोशल मीडिया पर लोग ये कयास लगा रहे हैं कि कहीं वे कांग्रेस (Congress) तो जॉइन नहीं करने वाले हैं। एक अर्थशास्त्री (Economist) के रूप में उनकी भविष्यवाणियां हमेशा लोगों को एक नए तरीके से सोचने पर मजबूर करती हैं। भारत की राजनीति में एक तबके ने लंबे समय से उनके बारे में यह राय रखी है कि वे वामपंथी राजनीति (Left Politics) के प्रबल समर्थक हैं। वे नरेंद्र मोदी सरकार की अर्थव्यवस्था को लेकर नीतियों की शुरू से आलोचना करते रहे हैं। अब राहुल गांधी के साथ उनकी नजदीकियां इस बात को हवा दे रही हैं कि कहीं वे कांग्रेस के नए मनमोहन सिंह तो नहीं बनने वाले हैं।

इकनॉमी से इतर भी दूसरे मुद्दों पर रहते हैं मुखर

राजन शुद्ध मैक्रोइकनॉमिक विषयों से इतर भी कई मुद्दों पर अपनी राय रखते हैं। राजन सरकार के साथ साठगांठ वाले पूंजीवाद से लेकर सांप्रदायिक हिंसा तक विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर मुखर रहे हैं। उदाहरण के लिए, अगस्त 2014 का उनका एक सार्वजनिक भाषण लेते हैं। राजन ने कहा था, ‘विकासशील देशों की ग्रोथ के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक मिडिल इनकम ट्रैप है, जहां सांठगांठ वाला पूंजीवाद एक कुलीनतंत्र बनाता है जो ग्रोथ को धीमा कर देता है।’ राजन का मतलब था कि मिडिल इनकम ट्रैप में अमीर और ज्यादा अमीर होते चले जाते हैं, लेकिन गरीब वहीं के वहीं रह जाते हैं। राजन ने आगे कहा था, ‘चुनाव के दौरान यह बहस का एक प्रमुख मुद्दा होना चाहिए। यह आज भारत में जनता की एक बहुत ही वास्तविक चिंता है। इस जाल से बचने के लिए और लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए हमारे नेताओं ने साठ-सत्तर साल पहले हमें अंग्रेजों से आजादी दी थी। हमें सार्वजनिक सेवाओं में सुधार करना होगा। विशेष रूप से गरीबों से जुड़ी सेवाओं में सुधार करना होगा।’

आरबीआई गवर्नर रहते हुए सरकार के साथ मतभेद की अटकलें

राजन ने साल 2013 में आरबीआई गवर्नर के रूप में कार्यभार संभाला था। भाजपा की नरेंद्र मोदी सरकार साल 2014 में सत्ता में आई। इसके बाद राजन ने साल 2016 में अपना पद छोड़ दिया था। उस समय उनके और सरकार के बीच मतभेद होने की अटकलें लगाई गईं थीं। राजन ने मोदी सरकार के साथ काम करते हुए भी उनके कामकाज की आलोचना करने में संकोच नहीं किया था। एक बार हिटलर का हवाला देते हुए उन्होंने कहा था कि ऐसा नहीं है कि एक मजबूत सरकार हमेशा सही दिशा में ही चले। राजन ने नोटबंदी की शुरू से ही आलोचना की थी।

क्या पक्षपात करते हैं राजन?

हाल ही में एक इंटरव्यू में राजन ने दावा किया था कि मौजूदा बीजेपी सरकार का मानना है कि जो लगातार उनके लिए ताली बजा रहे हैं, वे ही सही हैं, क्योंकि वह कुछ भी गलत नहीं करती हैं। उन्होंने कहा, ‘हर सरकार गलत करती है। मैंने यूपीए सरकार की आलोचना की है, जब मैं आरबीआई का हिस्सा नहीं था और मैंने पिछली एनडीए सरकार के साथ काम भी किया है।’ राजन ने कहा कि उनके पास पक्षपात करने का कोई कारण नहीं है और कुछ आलोचना जरूरी होती हैं। लेकिन राजस्थान में राहुल गांधी के नेतृत्व वाली भारत जोड़ो यात्रा में उनकी भागीदारी ने उनके आलोचकों को उन्हें पक्षपातपूर्ण कहने का मौका दे दिया है।

मुखर, लेकिन राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर खामोश

साल 2016 में आरबीआई छोड़ने के बाद से राजन अक्सर समाचार चैनलों और प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में दिखाई दिए। उन्होंने दुनियाभर में आर्थिक स्थितियों पर अपनी राय पेश की। लेकिन कई लोगों का मानना है कि वे भारतीय राजनीति में एंट्री लेकर अच्छा काम करेंगे। कुछ साल पहले अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (AAP) राजन को राज्यसभा सीट देना चाहती थी। इसके लिए आप ने राजन से संपर्क किया था। रिपोर्ट्स में कहा गया था कि उन्होंने तुरंत ही इस ऑफर को अस्वीकार कर दिया। उन्होने कहा, ‘मेरा जवाब है ‘ना’… राजनीति में एंट्री के बारे में मेरी पत्नी स्पष्ट रूप से मना करती है।’

आईएमएफ के मुख्य अर्थशास्त्री बन वैश्विक मंच पर आए

इसमे कोई रहस्य नहीं है कि राजन की महंगाई और ब्याज दरों में बढ़ोतरी को लेकर एप्रोच पर काफी असहमति आती थी, विशेषरूप से मोदी सरकार के दौरान उनके कार्यकाल में। साल 2003 और 2006 के बीच आईएमएफ में मुख्य अर्थशास्त्री के रूप में राजन के कार्यकाल ने उन्हें वैश्विक मंच पर पहुंचा दिया। साल 2005 में वित्तीय संकट के बारे में उनकी चेतावनी को काफी हद तक नजरअंदाज कर दिया गया था, लेकिन बाद में 2008 के वित्तीय संकट के दौरान उनकी प्रशंसा हुई।

भारत की ग्रोथ जॉब लेस ग्रोथ है

राजन ने जुलाई में दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि भारत की ग्रोथ बहुत हद तक एक जॉब लेस ग्रोथ है। इकनॉमी के लिए रोजगार पैदा होना काफी जरूरी है। उन्होंने कहा, ‘हम ऐसा नहीं कहते कि देश में हर कोई सॉफ्टवेयर इंजीनियर होना चाहिए, लेकिन हर किसी को एक अच्छे जॉब की जरूरत है।’ उन्होंने कहा था, ‘अपने युवाओं के लिए एजुकेशन की उचित व्यवस्था नहीं करके भारत उन्हें मेडिकल जैसी पढ़ाई के लिए विदेश जाने पर मजबूर कर रहा है।’

मुस्लिम समुदाय पर यह बोले थे राजन

कुछ महीने पहले राजन ने कहा था, ‘अगर मुस्लिम समुदाय से दूसरे दर्जे के नागरिकों जैसा व्यवहार होता रहा तो आंतरिक दरार पड़ेगी और बंटवारा होगा। ऐसा कोई भी प्रयास देश में विदेशी हस्तक्षेप को बढ़ावा देगा।’ गोमांस खाने की अफवाह पर दादरी में अखलाक की हत्या और देशभर में लव जिहाद जैसे मुद्दे पर भी राजन ने चिंता जताई थी। उन्होंने कहा था कि दादरी जैसे मामले भारत के लिए ठीक नहीं है। उन्होंने कहा था कि पीएम मोदी के इकनॉमी को रफ्तार देने के प्रयास ‘लव जिहाद’ और सांप्रदायिक हत्या के माहौल में कामयाब नहीं हो सकते।