मोदी 3.0 के तहत अब क्या चीन के साथ दोनों पक्षों के रिश्ते सुधारने की रणनीति बना रहा भारत

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अगले महीने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के लिए कजाखस्तान की राजधानी अस्ताना में होंगे। पिछले कुछ हफ्तों में भारत-चीन संबंधों को लेकर मिले संकेत मिले-जुले रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया द्वारा रणनीति में बदलाव से यह पता चलता है कि चीन के साथ व्यावहारिक सहयोग का रास्ता हो सकता है। चीन के साथ गलवान घाटी में हुई झड़प को चार साल पूरे हो चुके हैं। इसी घटना के बाद दोनों देशों के बीच संबंध खराब हो गए थे। अभी भी सीमा पर तनाव बना हुआ है। दोनों ही तरफ से 50 से 60 हजार सैनिक तैनात हैं। प्रधानमंत्री मोदी के लिए अपने तीसरे कार्यकाल में चीन के साथ संबंधों को सुधारना सबसे बड़ी चुनौती होगी।

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, 3-4 मई को दोनों नेता अस्ताना में हो रहे एससीओ शिखर सम्मेलन में शामिल तो होंगे, लेकिन अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि क्या दोनों के बीच मुलाकात होगी या नहीं। पीएम मोदी ने अप्रैल में न्यूजवीक मैगजीन को दिए इंटरव्यू में कहा था कि भारत के लिए, चीन के साथ संबंध महत्वपूर्ण और सार्थक हैं। मेरा मानना है कि हमें अपनी सीमाओं पर लंबे समय तक चले आ रहे गतिरोध को तत्काल सुलझाने की जरूरत है। उन्होंने कहा था कि भारत और चीन के बीच स्थिर और शांत संबंध सिर्फ हमारे दोनों देशों के लिए ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र और दुनिया के लिए भी जरूरी हैं।

मोदी ने कहा था कि मुझे उम्मीद है और भरोसा है कि हम अपनी सीमाओं पर शांति और स्थिरता बहाल करने और बनाए रखने में सक्षम होंगे।सीमा विवाद का हल निकलने के संकेतचीन ने भी पीएम मोदी के नजरिए पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता ने कहा कि भारत और चीन के बीच संबंध सीमाओं से बढ़कर हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देश सीमा विवाद से संबंधित मुद्दों को सुलझाने के लिए राजनयिक और सैन्य चैनलों के जरिए संवाद कर रहे हैं।

प्रवक्ता ने कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि भारत चीन के साथ मिलकर काम करेगा, द्विपक्षीय संबंधों को एक रणनीतिक ऊंचाई और भविष्य के नजरिए से देखेगा। विश्वास बनाने, संवाद और सहयोग में शामिल रहने, और मतभेदों को उचित रूप से संभालने का प्रयास करेगा ताकि संबंधों को एक स्वस्थ और स्थिर मार्ग पर रखा जा सके। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी जताई थी उम्मीदमई में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने लद्दाख में भी सीमा विवाद के बीच चीन के साथ बाकी मुद्दों को सुलझाने की उम्मीद जताई। लद्दाख में सीमा गतिरोध के बीच, विदेश मंत्री जयशंकर ने पीटीआई को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि मुख्य रूप से बचे हुए मुद्दे ‘पेट्रोलिंग के अधिकार’ और ‘पेट्रोलिंग की क्षमता से जुड़े हैं। दलाई लामा की विरासत हमेशा जिंदा रहेगी और शी जिनपिंग चले जाएंगे, यह बात पेलोसी ने कही।

चीन को लेकर मोदी के बयान पर जयशंकर ने कहा कि प्रधानमंत्री ने एक व्यापक नजरिया पेश किया है। उन्होंने कहा विवाद अब पेट्रोलिंग के अधिकार और पेट्रोलिंग की क्षमता तक सीमित हो गया है। पहले ये सीमा से पीछे हटने और तनाव कम करने की मांग कर रहा था। हालांकि लोकसभा चुनाव के बाद चीन से सीमा विवाद पर समाधान की उम्मीद जगी है। लेकिन कुछ अन्य घटनाओं ने जटिलताओं को भी उजागर किया। क्या इन दो घटनाओं ने बिगाड़ दिया खेल?पहली बात, प्रधानमंत्री और ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते के बीच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर संदेशों का आदान-प्रदान (जिसे सूत्रों ने दोनों नेताओं के बीच पहला सार्वजनिक बातचीत बताया) ने चीन को नाराज कर दिया, जिसे उसने उकसाने के तौर पर देखा। 5 जून को, राष्ट्रपति लाई (जिन्हें विलियम लाई के नाम से भी जाना जाता है) ने मोदी को फिर से सत्ता में लौटने पर बधाई दी, और तेजी से बढ़ती ताइवान-भारत साझेदारी को मजबूत बनाने और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति और समृद्धि में योगदान करने के लिए व्यापार, प्रौद्योगिकी और अन्य क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार करने की इच्छा जताई।

मोदी ने लाई को धन्यवाद दिया और निकट संबंधों और पारस्परिक रूप से लाभकारी आर्थिक और तकनीकी साझेदारी की उम्मीद जताई।चीन ने चीन के साथ राजनयिक संबंध रखने वाले देशों और ताइवान के अधिकारियों के बीच किसी भी तरह के आधिकारिक बातचीत का विरोध किया और भारत से ‘एक चीन’ नीति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता से पीछे नहीं हटने के लिए कहा। हालांकि, भारत और ताइवान के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं, बल्कि वे व्यापार, संस्कृति और शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करते हैं। चीन की संवेदनशीलता के कारण इन दोनों देशों के संबंधों को पिछले तीन दशकों से जानबूझकर हासिए पर रखा गया है।

दूसरी बात, अमेरिकी कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल ने बुधवार को धर्मशाला में दलाई लामा से मुलाकात की, जहां पूर्व हाउस स्पीकर नैंसी पेलोसी ने घोषणा की कि तिब्बती आध्यात्मिक नेता की विरासत हमेशा जीवित रहेगी, जबकि शी जिनपिंग चले जाएंगे और उन्हें किसी भी चीज का श्रेय नहीं दिया जाएगा। एक दिन बाद प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री एस जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल से मुलाकात की। इस अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की भारत यात्रा पर चीन की तीखी प्रतिक्रिया आई। चीन ने अमेरिका से “तिब्बत को चीन के हिस्से के रूप में मान्यता देने और ‘तिब्बत की स्वतंत्रता’ का समर्थन नहीं करने” की अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन करने का आग्रह किया।क्या कह रहे एक्सपर्ट्स?भारत और चीन के बीच हालिया घटनाओं को लेकर एक्सपर्ट्स की अलग-अलग राय है।

पहला नजरिया है कि भारत चीन के बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन साथ ही खुद को मजबूत दिखा रहा है। यह नजरिया प्रधानमंत्री मोदी और विदेश मंत्री जयशंकर के उन इंटरव्यू को आधार बनाता है जिनमें उन्होंने सीमा मुद्दे का समाधान निकालने की इच्छा जताई थी। साथ ही, यह नजरिया ताइवान के साथ भारत के संबंध और दलाई लामा से मुलाकात को चीन को यह संदेश देने के तौर पर देखता है कि भारत इस क्षेत्र के अन्य देशों के साथ भी रिश्ते बनाने में सक्षम है।वहीं दूसरा नजरिया है कि भारत शायद बेहतर डील का इंतजार कर रहा है। यह नजरिया कहता है कि शुरुआत में भारत का लक्ष्य चुनाव के बाद जल्दी से सीमा मुद्दे का समाधान निकालना था। लेकिन, उम्मीद से कम सीटें जीतने के बाद सरकार सतर्क हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत शायद रिश्तों को सुधारने से पहले चीन से कुछ रियायतों का इंतजार कर रहा है।