संपादकीय: इंदौर के महादेव झूलेलाल मंदिर में हादसा, धर्मस्थलों को सुरक्षित बनाएं

इंदौर के बेलेश्वर महादेव झूलेलाल मंदिर में रामनवमी के दिन हुआ हादसा जितना त्रासद और दुर्भाग्यपूर्ण है, उतना ही विचारणीय भी। रामनवमी के मौके पर मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ लगना कोई अप्रत्याशित बात नहीं थी। जाहिर है भीड़ को संभालने के लिए जिस तरह की चाक-चौबंद और चौकस व्यवस्था होनी चाहिए थी, उसका वैसे ही अभाव था जैसे आम तौर पर मंदिरों में होता है। मिली जानकारी के मुताबिक, मंदिर के अंदर बावड़ी को ढकने वाले स्लैब पर भी काफी लोग इकट्ठा हो गए थे। कोई उन्हें रोकने वाला या यह बताने वाला नहीं था कि यह स्लैब कमजोर है और ज्यादा लोगों का बोझ नहीं वहन कर सकता। वही हुआ भी। अचानक स्लैब धंस गया और उस पर खड़े तमाम लोग नीचे कुएं में गिर गए। मामले की जांच के आदेश तत्काल दे दिए गए। मृतकों के परिजनों और घायलों के लिए मुआवजा राशि घोषित करने में भी सरकार ने देर नहीं लगाई। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर क्यों हमें बार-बार विभिन्न धार्मिक स्थलों से ऐसे हादसों की खबरें सुनने को मिलती हैं? कभी किसी मंदिर की छत गिर जाती है तो कभी रेलिंग का हिस्सा टूटकर गिर जाता है। क्यों इन मंदिरों और अन्य धर्मस्थानों की मरम्मत और रखरखाव की व्यवस्था पर नजर नहीं रखी जाती? कानून के अनुरूप, उनकी जिम्मेदारी क्यों नहीं तय हो पाती? ताजा हादसे का भी यह एक अहम पक्ष है। मंदिर के अंदर स्थित बावड़ी को इस तरह ढका जाना गैरकानूनी तो था ही, स्थानीय प्रशासन को इसकी जानकारी भी थी। इस बारे में नोटिस भी दिया गया था। खबरों के मुताबिक जनवरी के आखिरी हफ्ते में इंदौर नगर निगम ने मंदिर के ट्रस्ट को अल्टीमेटम दे दिया था कि अगर एक सप्ताह के अंदर इस स्लैब को नहीं हटाया गया तो जबरन हटा दिया जाएगा और उसका खर्च मंदिर प्रबंधन से लिया जाएगा। नगर निगम का यह रुख बिलकुल सही था। लेकिन इसके बाद हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के आरोप लगने लगे। कहा जाने लगा कि नगर निगम प्रशासन मंदिर के अंदरूनी मामलों में बेवजह दखल दे रहा है। ऐसा लगता है कि कथित तौर पर हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं का वास्ता दिए जाने के बाद नगर निगम दबाव में आ गया। संभवत: इसीलिए जो काम एक सप्ताह की समय सीमा समाप्त होते ही शुरू हो जाना चाहिए था, उस दिशा में दो महीने बाद भी कोई प्रगति नहीं हुई। नतीजा यह कि रामनवमी के मौके पर श्रद्धालुओं को अपनी जान देकर इस लापरवाही की कीमत चुकानी पड़ी। आखिर कथित धार्मिक भावनाओं के नाम पर हमारी कानून व्यवस्था से जुड़ी एजेंसियां अक्सर लाचार क्यों दिखने लगती हैं? यह स्थिति बेहद खतरनाक है। एक बात यह भी है कि राज्य सरकारें अपने यहां के धर्मस्थलों का सुरक्षा ऑडिट क्यों नहीं करातीं ताकि ऐसे हादसे रोके जा सकें।