संपादकीय: भारी संघर्ष के बाद रुकी इमरान खान की गिरफ्तारी, पाकिस्तान में अशांति

कर्ज और आर्थिक बदहाली से घिरे में मंगलवार से शुरू हुआ को गिरफ्तार करने का हाईटेंशन ड्रामा आखिरकार बुधवार तीसरे पहर तक समाप्त हो गया। तोशाखाना के उपहार मामले में इमरान खान के लिए गैर जमानती वॉरंट जारी हुआ था। इसे तामील करने के लिए लाहौर में पुलिस जब उनके घर पहुंची तो इमरान समर्थकों ने उसे रोक लिया। पूरी रात इमरान खान के समर्थक उनके घर के बाहर डटे रहे तो पुलिस ने भी जमकर आंसू गैस के गोले छोड़े, पानी की बौछारें कीं। इस दौरान इमरान समर्थकों ने भी आगजनी की, पुलिस वालों को पीटा तो पाक सेना से रेंजर्स बुला लिए गए। रेंजर्स के आने के बाद इमरान खान ने आरोप लगाया कि ‘लंदन’ के इशारे पर सेना उनकी हत्या करना चाहती है। दरअसल, पूर्व पीएम इन दिनों लंदन में निर्वासित हैं। बहरहाल, निहत्थे लोगों से चौबीस घंटे से भी अधिक वक्त तक चले संघर्ष के बाद जब बुधवार को इमरान की गिरफ्तारी पर दुनिया भर की नजरें टिक गईं, तब कहीं जाकर पुलिस और रेंजर्स पीछे हटे। हालांकि पाक सरकार पीछे हटने की वजह लाहौर में होने वाले पाक क्रिकेट लीग का मैच बता रही है, मगर साफ है कि यह संघर्ष लंबा खिंचता तो कहीं न कहीं पाकिस्तान को मिलने वाली माली इमदाद पर भी असर पड़ता, जिसे पाने के लिए वह पिछले काफी दिनों से छटपटा रहा है।फिलहाल लाहौर में शांति है, मगर जिस तरह से ने देश भर में आंदोलन का एलान किया है, कहा नहीं जा सकता कि यह शांति कितने दिनों तक बरकरार रहेगी। पाकिस्तान में सेना को लेकर इमरान ने जैसा कड़ा रुख अख्तियार किया है, सेना भी अपने भविष्य को लेकर सशंकित है। इमरान ने सेना प्रमुख पर भी उनकी हत्या करने साजिश रचने का आरोप लगाया है। हालांकि सेना का कहना है कि सेना प्रमुख आसिम मुनीर घटना के वक्त वहां से 750 किलोमीटर दूर वजीराबाद में थे, इसलिए उनका इस मामले से कोई कनेक्शन नहीं है। मगर लोग सेना का भरोसा नहीं कर रहे हैं तो इसका साफ मतलब है कि इमरान अपनी बात आम लोगों तक पहुंचाने में कामयाब रहे हैं।वैसे इमरान कोई पहले नेता नहीं हैं, जो सेना के आक्रोश का सामना कर रहे हैं या फिर जिन्होंने तोशाखाना से उपहार न लिए हों। खुद तोशाखाने की रिपोर्ट में है कि 2002 के बाद वहां जितने भी पीएम बने, किसी ने भी अपने उपहार नहीं छोड़े। लेकिन इमरान उन सभी नेताओं में पहले नेता जरूर हैं जो सेना की हरकतें और बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं।पिछले दिनों पाकिस्तान में जितने भी साहित्य समारोह हुए, ढेरों पाकिस्तानी साहित्यकारों ने किसी न किसी तरह से सेना और अपनी सरकार को ऐसी हरकतों के लिए कटघरे में खड़ा किया और इमरान खान की खुलकर तारीफ की। जाहिर है कि मंगलवार और बुधवार को लाहौर में सुरक्षा बलों और इमरान समर्थकों के बीच जो कुछ हुआ, उससे इस्लामाबाद को एक बड़ा संदेश तो गया ही है।