नीतीश कुमार के रहते उपेंद्र कुशवाहा डिप्टी सीएम बन ही नहीं सकते, तो क्या पार्टी बनाने या बदलने वाले हैं?

पटना, 12 जनवरी. खरमास का अंत करीब आते-आते बिहार की गरमाई राजनीति पर ने पानी फेर दिया है। उन्होंने को डिप्टी सीएम बनाए जाने की अटकलों पर ये कहते हुए विराम लगाया .. ये सब फालतू बात है। इसस पहले राजद और कांग्रेस कोटे से एक-एक, दो-दो मंत्री और उपेंद्र कुशवाहा के डिप्टी सीएम की बात पटना कि सियासी फिजा में तैर रही थी। तारीख तय करनी थी तो कोई भी शुभ काम मकर संक्रांति के बाद ही होगा, इसलिए खरमास के बाद का अघोषित कार्यक्रम रख दिया गया । अब अटकलों को फालतू बताकर नीतीश ने जिस तल्खी से विराम लगा दिया है उससे संन्यास तोड़ने को बेकरार बैठे उपेंद्र कुशवाहा को झटका लगा होगा।दो नीतीश ने दो डिप्टी सीएम को भाजपाई करतब बताते हुए नई सरकार में इसकी जरूरत को नकार दिया। लेकिन सच्चाई कुछ और है। ग्रैंड डेमोक्रैटिक सेक्युलर अलायंस के सीएम उम्मीदवार रह चुके उपेंद्र कुशवाहा को नीतीश कुमार कभी भी डिप्टी सीएम की कुर्सी नहीं देंगे। कुछ देना होता तो पिछले साल अगस्त में तेजस्वी के साथ बने नए कैबिनेट में ही जगह मिल गई होती। डिप्टी सीएम के पोस्ट पर प्रमोशन तो कभी भी हो सकता है। आखिर कुछ इच्छा, आकांक्षा रही होगी तभी तो मार्च, 2021 में उन्होंने अपनी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का विलय जेडीयू में करा दिया। फिर मार्च 2021 से अगस्त 2022 के बीच क्या बदला? बदला तो बिहार का सियासी समीकरण। नीतीश कुमार भाजपा छोड़ तेजस्वी के साथ आ गए। यहीं पेच है। नीतीश को धुर विरोधी मानने वाले कुशवाहा ये दिन देखने के लिए साथ नहीं आए थे। इसलिए बिहार की उलट पलट वाली राजनीति में कुशवाहा फिर से पलटी मार उस तरफ तो जा सकते हैं लेकिन डिप्टी सीएम नहीं बन सकते।बल्कि मैं तो यहां तक कहूंगा कि खीर थ्योरी देने वाले कुशवाहा अगर आरजेडी में रहते तो चांस ज्यादा था। जी हां, वही खाने वाला खीर। बिहार की राजनीति में खीर सिद्धांत का प्रतिपादन 26 अगस्त, 2018 को हुआ। इसी दिन उपेंद्र कुशवाहा ने ज्ञान दिया था कि अगर कुशवाहा का चावल और यादव का दूध मिला दिया जाए तो स्वादिष्ट खीर का निर्माण हो सकता है। तब तक वो भाजपा के साथी थे और मोदी सरकार में मंत्री। लेकिन बिहार में राजनीति पलट चुकी थी। नीतीश कुमार के विरोध की बुनियाद पर 2014 से भाजपा के साथ रहे उपेंद्र कुशवाहा राजनीति की पिच पर खुद को हिट विकेट मान कर चल रहे थे। कारण साफ था। वही नीतीश कुमार अब भाजपा के समर्थन से बिहार के सीएम थे। 26 जुलाई, 2017 को जब तय हो गया कि नीतीश और सुशील मोदी की जोड़ी बिहार में फिर बनेगी उसके तीन दिन पहले ही उपेंद्र कुशवाहा ने भाजपा को सचेत किया था.. नीतीश कुमार जिस नाव पर सवार होंगे, उसका डूबना तय है। तो ये समझाने की जरूरत ही नहीं है कि नीतीश कुमार आज किस नाव पर सवार हैं। स्टियरिंग तेजस्वी को सौंपने के फैसले से कुशवाहा और आहत होंगे। ऊपर से कुढ़नी की हार के बाद वो जेडीयू की कमजोरी का इलाज ज्यादा खोज रहे हैं। इसिलए डिप्टी सीएम की थ्योरी को ठंडे बस्ते में रखिए। तीन पॉइंट्स में समझिए क्यों उन्हें नीतीश कुमार कभी ये ओहदा नहीं दे सकते।

1. लव-कुश समीकरण

लालू – नीतीश को एक ही सिक्के के दो पहलू बताने वाले उपेंद्र कुशवाहा बिहार की राजनीति में खुद का वजूद बनाने की कोशिश करते आए हैं। इस काम में वो 2007 से लगे हैं जब पहली बार नीतीश ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया था। 2015 के विधानसभा चुनाव में 23 सीटों में सिर्फ दो पर जीतने के बाद कुशवाहा ने नीतीश कुमार के बरक्स खुद को खड़ा करनी की तैयारी शुरू कर दी। तीन परसेंट के बदले 12 परसेंट का खेल है ये। कुशवाहा ने लव-कुश समीकरण को ध्वस्त कर नीतीश को सिर्फ अवधिया कुर्मी का नेता बताकर जमीनी स्तर पर एक वोट बैंक तैयार करने की शुरुआत की। लव यानी कुर्मी में भी तीन उपजातियां हैं – धनवार, समसंवार और जसवार। बांका, भागलपुर और खगड़िया में जसवार कुर्मियों की खासी आबादी है। यही नहीं कुशवाहा ने धानुक-दलित सम्मेलन भी आयोजित किया। कुशवाहा की कोशिश धुनिया, कहार-कुम्हार, बरही-लोहार, माली और मल्लाह का समीकरण तैयार करने की खी। कुशवाहा की खीर थ्योरी में जो पंचमेवा का जिक्र आया वो यही पांच जातियां हैं। कुशवाहा ने इस 17-18 परसेंट की तुलना में नीतीश को तीन परसेंट वाले नेता के तौर पर सिमटाने की कोशिश की। जुलाई, 2018 में नीतीश कुमार इससे इतने आहत हुए थे कि उन्होंने उमेश कुशवाहा को वैशाली में कुशवाहा महाभोज का आयोजन करने का आदेश दिया। जब फीडबैक मिला कि समाज में नीतीश के खिलाफ विरोध है तो सीएम चौंक गए। उन्होंने सीएम हाउस में ही लव-कुश नेताओं को बुला लिया। इसकी जिम्मेदारी संभाली जेडीयू यूथ विंग के अभय कुशवाहा ने। नीतीश के साथ जाने के बाद कुशवाहा को लगा कि वो अपने इस वोट बैंक से नीतीश का दिल जीत लेंगे और उन्हें नंबर टू की हैसियत मिलेगी। फिर 2025 के चुनाव में वो सीएम कैंडिडेट रहेंगे नहीं तो जेडीयू की तरफ से वो भाजपा के साथ उचित सौदेबाजी कर पाएंगे। लेकिन भाजपा तो अब सीन से ही गायब है।

2. कुशवाहा का डर

2019 में नीतीश कुमार पर हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाने वाले उपेंद्र कुशवाहा को डर है कि जेडीयू का विलय आरजेडी में हो जाएगा। तेजस्वी को कमान सौंपने के नीतीश के फैसले के बाद ये डर और बढ़ गया है। तभी उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि अगर ऐसा हुआ तो आत्मघाती कदम होगा। दरअसल जेडीयू में कुल जमा एक साल 9 महीने पहले आए उपेंद्र कुशवाहा को पार्टी से ज्यादा अपनी चिंता ज्यादा है। विलय की बेला में उनका क्या होगा, इस चिंता से ग्रसित हैं। हालांकि ये चिंता जेडीयू बड़े-बड़े नेताओं को खाए जा रही है।

3. नीतीश से पुरानी अदावत

नीतीश कुमार ने जब 2005 में कुर्सी संभाली तो उपेंद्र कुशवाहा को बहुत उम्मीद थी। कुशवाहा को लगता था कि उन्होंने जिस नेता को सीएम बनाने के लिए खून पसीने एक कर दिए वो उन्हें इनाम देगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 2004 में सुशील मोदी के लोकसभा जाने के बाद उन्हें विपक्ष का नेता जरूर बना दिया गया। लेकिन सत्ता मिलने के बाद कुछ नहीं मिलने से कुशवाहा नाराज हो गए। और नीतीश का पारा चढ़ गया। लिहाजा बतौर नेता प्रतिपक्ष जो बंगला मिला था उसे नीतीश ने फोर्स भेज कर खाली करा दिया। 2009 में जब वो एनसीपी से वापस जेडीयू में आए तो ललन सिंह नाराज हो गए। वही ललन सिंह जो मौजूदा पलटमार पॉलिटिक्स के सूत्रधार हैं जिसके कारण कुशवाहा हिट विकेट हो गए हैं। 2010 में तो राजगीर अधिवेशन में मंच से ही कुशवाहा ने नीतीश को सुना दिया और तानाशाह तक कह डाला। फिर 2013 में रालोसपा बना ली। मोदी से नीतीश खफा हुए तो कुशवाहा ने भाजपा का दामन थाम लिया। 2019 में अगर दो के बदले चार सीट मिल जाती तो शायद कुशवाहा भाजपा से अलग होते भी नहीं। लेकिन सियासी चाल में वो मात खा गए। महागठबंधन से चार सीटें मिलने और दो पर खुद लड़के बाद भी हर तरफ हार गए। फिर नीतीश के रास्ते इनडायरेक्टली एनडीए में आ गए। पर नीतीश की लीला ऐसी कि बिना प्रयास के ऑटोमैटिकली महागठबंधन में चले गए। इसलिए, अगर वो एनडीए में ही रहना चाहें तो क्या विकल्प है? आप समझ गए होंगे। इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।