पुणे का चांदनी चौक पुल ढहेगा तो हेवी ट्रैफिक का हल निकलेगा? सवाल है, सोल्यूशन नहीं

सवाल है कि पुणे का चांदनी चौक पुल क्यों ढहाया जा रहा है. जवाब है कि इस पुल की चौड़ाई कम है. इसलिए यहां बॉटलनेक तैयार हो रहा है. लोग अलग-अलग थ्री लेन, फोर लेन सड़कों से यहां पहुंचते हैं और अचानक यहां आकर सड़क पतली गर्दन की तरह हो जाती है और कई बार पांच मिनट में तय करने वाली दूरी चालीस मिनट तक में तय करनी पड़ती है. इस हद तक यहां लोग हेवी ट्रैफिक जाम से परेशान हैं. जबकि यह सड़क एक तरफ से तो मुंबई को तो दूसरी तरफ से बेंगलुरू को जोड़ती है.
इतना ही नहीं पुणे का चांदनी चौक पुल नांदेड़, सोलापुर, लवासा, भुलाव, पशान जैसे महाराष्ट्र के अन्य क्षेत्रों को भी जोड़ता है. इसके अलावा यह पुणे के अंदर भी एनडीए, वार्जे, बावधन से आने वाली कई सड़कों का जंक्शन प्वाइंट है. यह भोसरी, शिंदे नगर, प्रांजली पाटील नगरम, जिजाई नगर को कनेक्ट करता है. यहां से आईटी पार्ट नजदीक है. इंडस्ट्रियल एरिया करीब है, कई सरकारी और निजी कार्यालयों और शिक्षा संस्थानों को कनेक्ट करने वाली सड़कें भी यहीं से होकर गुजरती हैं. यानी इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह पुल कितनी अहम जगह पर है, जिसे ढहाया जा रहा है.
पुल ढहाने का विचार कैसे आया?
बात तो सही है कि यहां इस पुल की वजह से सड़क संकरी हो जा रही है और ट्रैफिक की समस्या बढ़ती ही जा रही है, इसलिए इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए चांदनी चौक पुल ढहाने का विचार आया. लेकिन यह विचार कैसे आया? दरअसल महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे 26 अगस्त को पुणे के दौरे पर थे. उनकी गाड़ियों का काफिला अचानक चांदनी चौक पुल में आकर फंस गया. बस फिर क्या, उन्होंने आनन-फानन में आस-पास के इलाके का जायजा लिया और नतीजे पर पहुंच गए सब इस पुल की वजह से हो रहा है. यह पुल गिराया जाएगा.
पुल ढहाकर नया पुल बनाने से क्या होगा?
इसके बाद फैसला हुआ कि जिस तरह नोएडा के ट्विन टॉवर को ढहाया गया है, उसी कंपनी और इंजीनियर्स को बुलाया जाए और यह पुल विस्फोटकों से उड़ाया जाए और फिर इससे कहीं चौड़ा पुल बनाया जाए. जब लेन ज्यादा होंगे, सड़कें चौड़ी होंगी, तो ट्रैफिक की समस्या हल होगी. बस फिर क्या? लोक लुभावन फैसले फौरन ले लिए गए. तैयारियां पूरी कर ली गईं. शुक्रवार को केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी हवाई सर्वे करके तैयारियों का जायजा ले लिया.और यह दावा भी कर गए कि एकाध साल में यानी रिकॉर्ड टाइम में नया पुल खड़ा हो जाएगा.
भयंकर स्थितियों का अंदाजा कोई नहीं लगा पा रहा
चूंकि दावा करने वाले नितिन गडकरी थे, इसलिए लोगों ने उन पर भरोसा भी झट कर लिया. वे पहले भी दावे पर खरे उतरते रहे हैं. अगर यह सच भी है, तो कोई भी अब तक इस बात को समझ सकता है कि इस रूट पर ट्रैफिक का कितना ज्यादा दबाव है. जब तक नया पुल बनेगा तब तक यहां से गुजरने वालों की क्या स्थिति होगी? ऐसे में संकट खड़ा हुआ तो उससे निपटने का क्या तरीका होगा?
चूरन बेचा जा रहा, कोई हल नहीं निकल पा रहा
इतने हेवी ट्रैफिक को यह शहर इस चालीस साल पुराने पुल की गैरमौजूदगी में कैसे झेल पाएगा? इसका कोई विजन है? नहीं, बस चूरन है. कोई सोल्यूशन नहीं है. हड़बड़ाहट में मीडिया इवेंट बनाकर लोकप्रिय फैसला लिया गया है. नया पुल बनने में अगर वक्त लगता है तो स्थिति आज से बद और बदतर होती चली जाएगी. तब तक अगली सरकार आएगी, वो अगले चुनाव तक पुल बनाएगी. पुणेकर जनता के लिए ट्रैफिक जाम की समस्या बढ़ती चली जाएगी.
हल बहुत सरल है, इच्छा शक्ति हो तो नहीं मुश्किल है
सवाल है कि फिर हल क्या है? हल सरल है. शनिवार को पीएम मोदी ने 5 जी लॉन्च कर दिया. गौर कीजिएगा यह सुविधा पहले 12 शहरों के लिए दी गई हैं. जाहिर सी बात है कि कोई भी कंपनी चाहे वो जियो हो या एयरटेल या वोडाफोन, वहीं सबसे पहले आएगी जहां उन्हें बिजनेस दिखेगा. 12 शहरों में महाराष्ट्र का मुंबई और पुणे है. इनके अलावा देश के बाकी शहरों में दिल्ली, गुड़गांव, बेंगलुरू, हैदराबाद, चेन्नई, चंडीगढ़, अहमदाबाद, गांधीनगर, जामनगर, कोलकाता हैं. लेकिन सोचिए जरा सोचिए क्या पुणे में पब्लिक ट्रांसपोर्ट का वो सिस्टम है जैसा दिल्ली की मेट्रो या बस सेवा है या फिर मुंबई की लोकल ट्रेन सेवा है? या फिर बेंगलुरू की बात करें तो वहां की बस सर्विस से पुणे की बस सर्विस से तुलना करके देख लें तो जवाब मिल जाएगा.
पब्लिक ट्रांसपोर्ट ही विकल्प है, बाकी सारे बस खिंचते हुए प्रकल्प हैं
हालांकि सुधार हो रहा है. पुणे में इलेक्ट्रिक बसें चलने लगी हैं. हां, दिल्ली और मुंबई की तरह लगातार एक के बाद एक आती हुई बसें दिखाई नहीं देती, लेकिन फ्रीक्वेंसी बढ़ाई जा सकती है. मेट्रो सेवा भी अब रामवाड़ी से वनज वाली चांदनी चौक तक पहुंच ही गई है. पब्लिक ट्रांसपोर्ट को ही आगे बढ़ाया गया तो सोल्यूशन यहीं से निकलेगा. ट्रैफिक का दबाव तभी कम होगा और कोई रास्ता नहीं है.