नीतीश कुमार की NDA में वापसी हुई तो कैसे बीजेपी और जदयू दोनों को फायदा? पूरा गण‍ित समझि‍ए

नई दिल्ली: बिहार की राजनीति में घमासान मचा है। इस सियासी उठापटक का आने वाले लोकसभा चुनाव पर सीधा असर पड़ना है। यही कारण है कि हर तरफ एक ही सवाल है। क्‍या बिहार के सीएम बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में वापसी करेंगे? अगर वाकई ऐसा होता है तो यह आगामी लोकसभा चुनावों से पहले जदयू और भगवा पार्टी दोनों के लिए फायदे का सौदा होगा। यही कारण है कि बीजेपी के सभी दिग्‍गज इस सियासी उठापटक के सभी पहलुओं पर मंथन करने में जुटे हैं। बीजेपी के दिग्गज नेताओं ने शुक्रवार को लगातार तीसरे दिन दिल्ली में शीर्ष स्तर पर बैठक की।पिछले लोकसभा चुनाव में NDA ने जीती थीं 39 सीटेंएनडीए ने 2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार की 40 में से 39 सीटों पर जीत हासिल की थी। तब इसमें बीजेपी, जदयू और लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) शामिल थीं। अगर नीतीश कुमार वापस एनडीए में आते हैं तो बीजेपी की बिहार में वही प्रदर्शन दोहराने की उम्‍मीद बढ़ जाएगी। बीजेपी के लिहाज से यह एक और कारण से अहम है। भगवा पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में 400 का आंकड़ा पार करने का टारगेट सेट किया है। बिहार में पिछला प्रदर्शन दोहराए बगैर यह लक्ष्‍य हासिल कर पाना मुश्किल होगा। बीजेपी के लिए नीतीश और लालू एकसाथ मिलकर बिहार में बड़ी चुनौती पेश कर सकते हैं। खासतौर से हाल में जाति सर्वेक्षण के बाद जिसका समर्थन सीएम ने किया था। बीजेपी 2020 के विधानसभा चुनाव में पहली बार जदयू के सीनियर पार्टनर के रूप में उभरी थी। लेकिन, भगवा पार्टी को राज्य में अपनी उपस्थिति को मजबूत करने के लिए कुछ और वक्‍त लग सकता है। दूसरी ओर अगर नीतीश कुमार वापसी का फैसला लेते हैं तो उन्हें भी आगामी लोकसभा चुनावों में इस कदम से फायदा होने की उम्मीद है। जदयू ने 2019 में 16 लोकसभा सीटें जीती थीं। वह इस साल अपनी सीटों में सुधार करना चाहेगी। जाति सर्वेक्षण के हथियार से लैस नीतीश राज्य में अपनी पहुंच का विस्तार करने के लिए भव्य राम मंदिर उद्घाटन के बाद बीजेपी के हिंदुत्व एजेंडे का फायदा जोड़ना चाहेंगे।व‍िपक्षी गठबंधन में रहा खट्टा अनुभव बिहार के सीएम का विपक्षी गठबंधन में खट्टा अनुभव रहा है। बीजेपी के खिलाफ पार्टियों को एकजुट करने में उनकी भूमिका को कांग्रेस और कुछ अन्य सहयोगियों ने ज्‍यादा तवज्‍जो नहीं दी। नीतीश को उम्मीद थी कि उन्हें विपक्षी गठबंधन के नेता के रूप में पेश किया जाएगा। हालांकि, ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल उनकी राह का रोड़ा बने। उन्‍होंने इस भूमिका के लिए कांग्रेस प्रमुख मल्लिकार्जुन खरगे को चुना। जदयू प्रमुख गठबंधन में कांग्रेस की ‘बड़े भाई’ वाली भूमिका और सीट-बंटवारे की बातचीत में देरी से भी नाराज थे।नीतीश कुमार राज्‍य में बीजेपी और राजद दोनों के जूनियर पार्टनर बनकर रह गए हैं। उन्‍हें तेजस्वी यादव को मौका देने के लिए लालू प्रसाद की पार्टी के भारी दबाव का सामना भी करना पड़ रहा है। तेजस्‍वी ने दो बार डेप्‍युटी सीएम के तौर पर राज्‍य की कमान संभाली है। अगर नीतीश कुमार बीजेपी के साथ जाते हैं तो कम से कम अगले विधानसभा चुनाव तक सीएम के रूप में अपना पद सुरक्षित रखने में कामयाब हो सकते हैं। इसके अलावा केंद्र में बीजेपी की सत्ता में वापसी की संभावनाओं के साथ अगर भगवा पार्टी अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के बाद राज्य में सीएम पद का दावा करने का फैसला करती है तो वह अच्छी केंद्रीय भूमिका की उम्मीद कर सकते हैं।एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि लालू और उनके बेटे तेजस्वी बिहार में काफी जनाधार वाले नेता हैं। जबकि बीजेपी के पास अभी भी राज्य में व्यापक अपील वाला कोई नेता नहीं है। भगवा पार्टी कई अन्य राज्यों की तरह बिहार में चुनाव जीतने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे और लोकप्रियता पर निर्भर है। इसके अलावा अगर नीतीश कुमार फिर से एनडीए गठबंधन में वापस आते हैं तो बीजेपी को यह भी देखना होगा कि उनकी पूरी पार्टी, खासतौर से उनके पूरे विधायक जेडीयू के साथ बने रहते हैं या नहीं। कारण है कि सरकार बनाने के लिए जेडीयू का एकजुट रहना जरूरी है।