कैसे आए 300 सैनिक? चीन ने करार तोड़े, अब भारत भी ‘जैसे को तैसे’ स्टाइल में देगा जवाब!

नई दिल्ली: भारत और चीन के सैनिकों के बीच अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर में एलएसी पर झड़प की खबर सामने आई। चीन के साथ झड़प में भारतीय सैनिकों ने मुंहतोड़ जवाब दिया है जिसके बाद चीनी सेना पीछे हटने के मजबूर हुई। इस झड़प में दोनों ओर से सैनिक घायल हुए हैं। यह घटना 9 दिसंबर की है। बताया जा रहा है कि चीन की ओर से सैनिकों की संख्या करीब 300 थी। ऐसा ही कुछ ढाई साल पहले डोकलाम में देखने को मिला था। माना जा रहा है कि अरुणाचल प्रदेश में भारत की ओर से कराए जा रहे निर्माण कार्य की वजह से चीन बौखलाया है और इसी कारण उसकी ओर से ऐसी हरकत की गई। वहीं चीन के साथ इस झड़प के बाद रक्षा एक्सपर्ट इस बात को कह रहे है कि अब वक्त आ गया है कि चीन को यह अल्टीमेटम दिया जाए कि ऐसी घटना हुई तो वह 1993 और 96 के समझौते को नहीं मानेंगे।

आखिर चीन की ओर से क्यों हुई ऐसी हरकत

भारतीय सैनिकों ने नौ दिसंबर को अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर में एलएसी पर चीनी सैनिकों का डटकर सामना किया। इस झड़प में भारत के 6 सैनिक घायल बताए जा रहे हैं जिनका गुवाहाटी में इलाज चल रहा है। वहीं चीन के अधिक सैनिकों के घायल होने की खबर है। बताया जा रहा है कि चीनी सैनिकों की ओर से पत्थरबाजी भी की गई। गलवान के बाद से ही भारत और चीन के बीच रिश्ते ठीक नहीं हैं। इस बीच यह भी समझने की जरूरत है कि आखिर चीन बार-बार नॉर्थ ईस्ट के इलाके को क्यों टारगेट कर रहा है। पिछले कुछ समय से अरुणाचल प्रदेश में केंद्र सरकार लगातार इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत कर रही है। 40 हजार करोड़ से हाइवे का निर्माण हो रहा है। चीन को यह बात खटक रही है। इसलिए भी उसकी नजर नॉर्थ ईस्ट पर है।

दोनों देशों के बीच बॉर्डर निर्धारित नहीं है और चीन कई इलाकों पर दावा करता है। चीन अरुणाचल को लेकर भी क्या दावा करता है यह बात सभी जानते हैं। चीन की आदत धोखा देने की है। चीन भारत की तैयारी से बौखलाया हुआ है। यही वजह है कि चीन की ओर से यह कोशिश हुई। हालांकि यह उसकी सोची समझी चाल भी हो सकती है क्योंकि एक साथ 300 सैनिक नहीं आ सकते।

समझौते को लेकर चीन को देना होगा अल्टीमेटम

मेजर जनरल विशंभर दयाल ने एक चैनल से बातचीत करते हुए कहा कि चीन किसी समझौते को मानता नहीं है। यदि हमारा दुश्मन इस किस्म का है तो हमें भी अपने रवैये में बदलाव करना होगा। भारत की ओर से भी चीन को यह बताने की जरूरत है कि 1993 और 1996 का जो समझौता है यदि यह हरकत हुई तो वह इसको नहीं मानेगा। पिछले 5-6 साल से चीन ऐसे ही कर रहा है। इस समझौते को यदि भारत नहीं मानेगा तो सेना अपने तरीके से निपटेगी उस वक्त चीन एक कदम आगे नहीं बढ़ेगा। इसको रोकने के लिए एक तरीका है कि चीन को अल्टीमेटम देना होगा।

वहीं एक दूसरे रक्षा विशेषज्ञ का कहना है कि अरुणाचल को लेकर चीन क्या सोच रहा है इस बात को ध्यान में रखकर भारत भी तैयारी कर रहा है। भारतीय सेना की इस वक्त अलग-अलग टुकड़िया वहां है। सेना के लिए सड़क का निर्माण हो रहा है यह बात चीन को चुभ रही है। भारतीय सेना नक्शे के साथ पेट्रोलिंग करती है लेकिन चीन का नक्शा बदलता रहता है। 300 सैनिक आते हैं तो यह उनकी सोची समझी चाल है और इरादा गलत है। फ्लैग मीटिंग हो गई लेकिन मामला खत्म हुआ है यह नहीं कहा नहीं जा सकता है।

चीन और भारत के बीच कब-कब हुई झड़प

  • 1967 नाथूल दर्रे के पास टकराव
  • 1975 अरुणाचल के तुलुंग पर भिड़ंत
  • 1987 तवांग में टकराव
  • 1987 समदोरांग चू इलाके में विवाद
  • 2017 डोकलाम में टकराव
  • 2020 गलवान में टकराव

क्या है 1993 और 1996 का समझौता

चीन के साथ 90 के दशक में रिश्तों को पटरी पर लाने की शुरुआत हुई। 1993 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव चीन दौरे पर गए थे इसी दौरान उन्होंने चीनी प्रधानमंत्री ली पेंग के साथ एलएसी पर शांति के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते में यह साफ कहा गया कि दोनों ओर के सैनिक एलएसी को पार करते हैं तो दूसरी ओर से आगाह करने पर वह तुरंत अपने क्षेत्र में चले जाएंगे। 3 साल बाद इस समझौते को और आगे बढ़ाया गया।

साल 1996 में भारत-चीन के बीच एक अहम समझौता हुआ जिसमें सीमा पर शांति के लिए बात थी। तत्कालीन चीनी राष्ट्रपति जिआंग जेमिन और भारत के तत्कालीन पीएम एचडी देवगौड़ा के बीच एलएसी पर भरोसा बनाने के लिए हस्ताक्षर हुए। इस समझौते के तहत यह तय हुआ कि दोनों देशों की ओर से सीमा पर गोलीबारी नहीं की जाएगी। वास्तविक नियंत्रण रेखा से 2 किलोमीटर के भीतर किसी भी तरह के बंदूक, रसायनिक हथियार की अनुमति नहीं होगी। हालांकि इसमें एक आर्टिकल 6 भी था जिसमें कई महत्वपूर्ण बातें थीं। पिछले कई मौकों पर देखा गया है कि भारत तो इन समझौतों को मानता है लेकिन चीन दरकिनार कर देता है।