इतिहास गवाह है…राजा-महाराजा और सुल्तान वाले स्टाइल में सोचा होता तो आज दिल्ली न होती प्यासी

नई दिल्ली: भीषण गर्मी के बीच इस वक्त राजधानी दिल्ली में पानी की काफी किल्लत है। कई इलाकों में पानी नहीं आ रहा और लोग टैंकर के पीछे भाग रहे हैं। पानी को लेकर सियासत भी शुरू है। दिल्ली की ओर से पड़ोसी राज्य पर आरोप लगाया जा रहा है। कुछ ही दिन पहले दक्षिण दिल्ली के महरौली इलाके में पानी का टैंकर आया तो देखकर ऐसा लगा कि पानी के लिए जंग छिड़ी हो। राजधानी दिल्ली में पानी की दिक्कत कोई नई नहीं है लेकिन इस बार भीषण गर्मी और बारिश न होने से मामला अधिक बिगड़ गया है। आजादी से पहले भी कई शासकों ने दिल्ली पर राज किया। भौगोलिक स्थिति ऐसी जिससे पानी की दिक्कत रही है लेकिन तब के शासकों ने इस समस्या को मात देने के लिए तरीका खोज निकाला था। उन्होंने लोगों की प्यास बुझाने के लिए हौज, बावली और नालों का जाल बिछा दिया था लेकिन आधुनिक युग में नलों से भी पानी आना बंद हो गया है।पानी की दिक्कत को देखते हुए बहुत पहले हुआ था यह फैसलादिल्ली को सदियों से पानी की समस्या का सामना करना पड़ा है। लेकिन आज जो स्थिति है वैसी पहले कभी नहीं थी। दिल्ली के शासकों ने पानी की दिक्कत को दूर करने के लिए खास उपाय किए। मध्ययुगीन बावलियों का एक समूह है, जो कभी दक्षिण दिल्ली के पड़ोस और आसपास के इलाकों को पानी पहुंचाता था। काफी साल पहले राजाओं, सुल्तानों और सेठों ने इन्हें बनवाया था, जिनमें शामिल हैं अनंग ताल की बावली, कुतुब साहिब की बावली, राजों की बावली और गंधक की बावली। यह कहना गलत नहीं होगा कि इनमें यहां का इतिहास छिपा है।21 वीं सदी में दिल्ली का ये हालजिन शासकों ने इनका निर्माण करवाया उन्होंने शायद इसकी कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि ये ये संरचनाएं 21वीं सदी तक टिक पाएंगी। विकसित दिल्ली के निवासियों को पानी के लिए जूझने की शायद ही कल्पना की गई हो। ये बावलियां 21वीं सदी तक तो पहुंचीं, लेकिन उनमें पानी की आपूर्ति नहीं पहुंची, जिससे पहले से ही शुष्क दिल्ली और भी प्यासी हो गई। यह कल्पना करना मुश्किल है कि सूखी दिल्ली कभी एक विस्तृत, आत्मनिर्भर हाइड्रोलिक प्रणाली का घर हुआ करती थी, जिसमें बावलियां एक अभिन्न अंग थीं।राजधानी कायम रहे, वर्षों पहले यह बात सोची गई थीबावलियों को नालों से पानी मिलता था, जो अरावली की मौसमी धाराओं और बांध तटबंधों से बनी थीं। बड़े शहरी तालाब (हौज) भी इस अरावली की मौसमी धाराओं से बने नालों से पानी पाने वाली बावलियां,बांध कहे जाने वाले तटबंध और बड़े शहरी तालाब (हौज) कभी उस व्यवस्था का हिस्सा थे जो यह सुनिश्चित करती थी कि राजधानी दिल्ली सूखी न रहे। राजपूतों से लेकर तुर्कों और मुगलों तक के शासकों ने यह सुनिश्चित किया कि उनकी राजधानी कायम रहे और पानी की दिक्कत न हो। इतिहास से भी सबक लेने को तैयार नहीं तैमूर ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि हौज खास जलाशय इतना बड़ा था कि एक ओर से दूसरी ओर तीर नहीं चलाया जा सकता था। यह बरसात के मौसम में बारिश के पानी से भर जाता है और दिल्ली के सभी लोगों को साल भर इससे पानी मिलता था। नजफगढ़ नाला जो आज शहर में सीवर के रूप में बहता है, वास्तव में साहिबी नदी का विस्तार था जो यमुना से मिलती थी। प्रसिद्ध बारापुला पुल (एलिवेटेड बारापुला कॉरिडोर नहीं), जिसे अब बारापुला नाला के नाम से जाना जाता है, उसके नीचे कभी एक प्राकृतिक जलधारा बहती थी। यह बात अब इतिहास है लेकिन ऐसा लगता है कि इतिहास से भी सबक लेने को हम तैयार नहीं हैं।