‘खरगे कांग्रेस के नए बॉस, पर इतिहास गवाह है कांग्रेस को पड़ती है गांधी परिवार की जरूरत’

नई दिल्ली: कांग्रेस के नए अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे चुने गए हैं। मल्लिकार्जुन खरगे का चुना जाना इस बात की पुष्टि करता है कि गांधी परिवार की ताकत बरकरार रहेगी। कोई इस बात की यदि उम्मीद कर रहा है कि खरगे स्वतंत्र होकर फैसले लेंगे यह एक कल्पना है। कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव हारने वाले शशि थरूर के पास परिवार की छाप को छोड़कर सभी संभव योग्यताएं थीं। विश्लेषकों का मानना है कि गांधी परिवार कांग्रेस का दायित्व है। राहुल गांधी जो इस वक्त पदयात्रा कर रहे हैं वह चुनाव नहीं जीत सकते। सोनिया गांधी की उम्र अधिक हो गई है और उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। कर्नाटक और मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिर गई और यह आशंका बाकी बचे दो राज्यों पर भी है। पार्टी के भीतर कलह से कांग्रेस के अंतिम दो राज्य राजस्थान और छत्तीसगढ़ पर खतरा बरकरार है।

परिवार के बिना पार्टी की जीत पर सवाल
यह विश्वास करना कि कांग्रेस के नए अध्यक्ष गांधी परिवार की जगह ले सकते हैं यह एक सपना है। बगैर गांधी परिवार के पार्टी चुनाव जीत नहीं सकती, यह बात पार्टी के साथ चिपकी हुई है। गांधी परिवार के बगैर पार्टी के चुनाव जीतने की क्षमता कम हो जाती है और पूर्व में ऐसा देखने को भी मिला है। लाल बहादुर शास्त्री 1964 में नेहरू के उत्तराधिकारी बने, लेकिन 1966 में उनकी मृत्यु हो गई। पार्टी के आकाओं ने इसके बाद इंदिरा गांधी को चुना। सिंडिकेट के नेताओं ने यह सोचकर इंदिरा गांधी को चुना कि परिवार के नाम पर वोट मिलेगा और असली ताकत उनके पास रहेगी। 1967 के चुनाव में कांग्रेस को संसद में बड़ा झटका लगा साथ ही अधिकांश उत्तर भारतीय राज्यों में उसे सत्ता गंवानी पड़ी। सिंडिकेट के कई बड़े नेता चुनाव हार गए और यह साबित हो गया कि मतदाताओं ने संगठन की जगह परिवार को प्राथमिकता दी।

इंदिरा ने सिंडिकेट नेताओं का कांटा निकाल फेंका
इंदिरा गांधी ने अपने समर्थकों को लेकर न केवल नई पार्टी बनाई और बाद में यही असली कांग्रेस साबित हुई। इंदिरा गांधी ने कांग्रेस आर (रिक्विजिनिस्ट) के नाम से नया संगठन बनाया और सिंडिकेट के प्रभुत्व वाली कांग्रेस का नाम कांग्रेस ओ यानी कांग्रेस ( ऑर्गनाइजेशन)। इंदिरा गांधी ने सिंडिकेट के कांग्रेसी नेताओं का कांटा निकाल फेंका। 1971 के चुनाव में उन्होंने कांग्रेस (ओ) और अन्य सभी दलों को हराया। इस चुनाव में कांग्रेस मतलब इंदिरा के नारे ने जोर पकड़ा। आपातकाल की वजह से इंदिरा गांधी की लोकप्रियता कम हुई। 1977 के चुनाव में, कांग्रेस (ओ) और अन्य विपक्षी दलों ने मिलकर जनता पार्टी बनाई। इंदिरा चुनाव हार गईं। कांग्रेस (ओ) के पूर्व प्रमुख मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने।

सोनिया गांधी का इनकार और उसके बाद रिजल्ट
इंदिरा गांधी की खराब छवि के बावजूद मतदाताओं ने इंदिरा पर भरोसा जताया और उन्होंने 1980 में सत्ता में वापसी की। 1984 में इंदिरा की हत्या कर दी गई। राजीव गांधी ने उनकी जगह ली लेकिन 1991 के चुनाव के दौरान उनकी भी हत्या कर दी गई। सोनिया गांधी ने उनकी जगह लेने से इनकार कर दिया। उनके इस फैसले से पार्टी में निराशा हुई। पार्टी ने एक गैर-गांधी नेता नरसिम्हा राव को चुना। उनके नेतृत्व में, 1991 में कांग्रेस ने 232 सीटें जीतीं, जो बहुमत से कम थी। एक बड़े आर्थिक संकट के बीच नरसिम्हा राव ने अपनी अल्पसंनख्यक सरकार का नेतृत्व किया। 1996 के चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 140 सीटें मिली। नरसिम्हा राव के बाद एक और कम प्रभावशाली सीताराम केसरी ने राव की जगह ली। बतौर अध्यक्ष उनकी विदाई किसी से छिपी नहीं है। उनके कार्यकाल में कई नेताओं ने दल भी बदले। कांग्रेसियों ने सोनिया गांधी से कहा कि वह अकेले ही पार्टी को बचा सकती हैं। वह पार्टी का नेतृत्व करने के लिए सहमत हो गईं। 1998 में सोनिया के नेतृत्व में कांग्रेस ने 141 सीटें जीतीं। 1999 के चुनाव में यह गिरकर 114 सीटों पर आ गई। सोनिया गांधी के नेतृत्व में 2004 और 2009 में लगातार दो जीत पार्टी ने दर्ज की। आज आलोचक फिर से पार्टी से गांधी परिवार को छोड़ने का आग्रह करते हैं लेकिन इतिहास बताता है कि यह मूर्खतापूर्ण होगा।

भारतीय राजनीति में परिवार का दखल सिर्फ एक पार्टी तक सीमित नहीं
कांग्रेस ही नहीं अन्य पार्टियों में भी मतदाताओं ने परिवार के नेताओं को तरजीह दी है। हालांकि भाजपा इसमें सबसे बड़ा अपवाद है। कम्युनिस्ट भी अपवाद हैं लेकिन उनकी स्थिति ठीक नहीं है। कई बार यह देखने को मिला है कि मतदाता कई नेताओं के साथ जुड़ते हैं लेकिन किसी पार्टी लेबल के साथ नहीं। मतदाता दलबदलुओं को दंडित करते भी कई मौकों पर दिखाई नहीं देते। आंध्र प्रदेश में एक पारिवार (जगन मोहन रेड्डी) ने दूसरे (गांधी परिवार) को हटा दिया। नवीन पटनायक ने जनता दल से अलग होकर अपने पिता के नाम पर पार्टी बनाई। उत्तर प्रदेश में मुलायम यादव, महाराष्ट्र में ठाकरे, बिहार में लालू प्रसाद, कर्नाटक में देवेगौड़ा और तमिलनाडु में करुणानिधि ऐसे कई उदाहरण हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका भी परिवार का दबदबा देखने को मिलता है।

(हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया में 23 अक्टूबर 2022 को स्वामीनाथन एस. अलंकेसरिया अय्यर के नियमित स्तंभ स्वामीनॉमिक्स का हिंदी अनुवाद)