तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के गुजारा-भत्ते पर हाई कोर्ट ने दिया यह हक

प्रयागराज: ने कहा है कि तलाकशुदा मुस्लिम महिलाएं भी पूर्व पति से गुजारा-भत्‍ता पाने की हकदार हैं। बशर्तें उन्‍होंने दोबारा शादी न की हो। गाजीपुर की फैमिली कोर्ट का फैसला रद्द करते हुए हाई कोर्ट ने यह व्‍यवस्‍था दी। जाहिद खातून की अपील पर जस्टिस सूर्य प्रकाश केसरवानी और जस्टिस मोहम्‍मद अजहर हुसैन इदरीसी की डिविजन बेंच सुनवाई कर रही थी।

फैमिली कोर्ट ने कहा था कि जाहिद को केवल ‘इद्दत’ के समय (तलाक से तीन महीने 13 दिन बाद तक) का ही गुजारा-भत्‍ता मिलेगा। हाई कोर्ट ने कहा क‍ि हमारे हिसाब से फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज ने बड़ी चूक की है।

HC ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने दनियाल लतीफ व अन्‍य बनाम भारत सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ठीक से नहीं समझा। इस फैसले में कहा गया था कि तलाकशुदा पत्‍नी के भविष्‍य के लिए इंतजाम करना मुस्लिम शौहर की जिम्‍मेदारी है।

तीन महीने में तय होगी गुजारा-भत्‍ते की रकम, तब तक अंतरिम भत्‍ता देने का निर्देशफैसला सुनाने के साथ हाई कोर्ट ने मामला गाजीपुर के मैजिस्‍ट्रेट को वापस भेज दिया। अब मैजिस्‍ट्रेट कानून के हिसाब से गुजारा-भत्‍ते की रकम तय करेंगे।

शौहर को तीन महीने का वक्‍त दिया गया है कि वह अपीलकर्ता को संपत्ति वापस करे। 20 दिसंबर के फैसले में, हाई कोर्ट ने कहा था कि तब तक पति को तलाकशुदा पत्‍नी को अंतरिम भत्‍ता देना चाहिए। अंतरिम भत्‍ता फैसला होने तक या तीन महीने के लिए, जो भी पहले हो, दिया जाना है। 5000 रुपये प्रति माह के हिसाब से हर महीने की 10 तारीख से पहले भुगतान हो जाना चाहिए।

1989 में निकाह हुआ था, 2000 में तलाकअपीलकर्ता जाहिदा खातून ने मुस्लिम रीति-रिवाजों के साथ 21 मई, 1989 को नरुल हक से निकाह किया था। शादी के वक्‍त, शौहर के पास नौकरी नहीं थी मगर बाद में वह डाक विभाग में पोस्‍टल असिस्‍टेंट हो गया। 28 जून, 2000 को उसने जाहिदा को तलाक देकर 2002 में किसी और महिला से निकाह कर लिया।

हालांकि, उसने न तो जाहिदा को कोई गुजारा-भत्‍ता दिया, न ही उसका सामान लौटाया। 2 सितंबर 2002 को जाहिदा ने गुजारे व अन्‍य की मांग करते हुए गाजीपुर जिला अदालत की फैमिली कोर्ट में मुकदमा दायर किया।