संपादकीय: राहुल की सदस्यता रद्द, विपक्ष को मिला एकजुटता का नया आधार, बढ़ेगा राजनीतिक टकराव

मानहानि के एक मामले में सूरत कोर्ट का फैसला आने के बाद जिस तेजी से लोकसभा सचिवालय ने कांग्रेस नेता की संसद सदस्यता रद्द करने का ऐलान किया, वह भारतीय राजनीति के लिए नई चीज है। हालांकि जो हुआ, वह नियम-कानून के अनुरूप ही है। यह बात भी दिलचस्प है कि जिस कानून के तहत राहुल गांधी की संसद सदस्यता छिनी है, वह 2013 में खुद उन्हीं के हस्तक्षेप के बाद बना था। तब राहुल गांधी ने तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा लाए जा रहे इस कानून से राहत दिलाने से संबंधित अध्यादेश की कॉपी सार्वजनिक तौर पर फाड़ दी थी। इस लिहाज से विरोधी यह तर्क दे सकते हैं कि जिस कानून की हिमायत खुद राहुल गांधी ने इतनी शिद्दत से की थी, उसके लागू होने पर कांग्रेस इतनी हाय-तौबा क्यों मचा रही है। लेकिन यह सिक्के का सिर्फ एक पहलू है। लोकतंत्र में कानून की बारीकियों की अहमियत तो होती है, लेकिन यह सवाल भी कम महत्वपूर्ण नहीं होता कि आम लोग किसी मुद्दे को किस रूप में देखेंगे। और आम लोगों के नजरिए से इस सवाल को अनदेखा करना मुश्किल है कि अपराध चाहे जो भी हो, खुद अदालत ने भी सजा पर अमल से पहले इसके खिलाफ अपील के लिए राहुल गांधी को 30 दिनों की मोहलत दी थी।ऐसे में लोकसभा सचिवालय ने उनकी संसद सदस्यता रद्द करने में जो जल्दबाजी दिखाई है, उसका सरकार के साथ चल रही उनकी तनातनी से कोई रिश्ता नहीं है, यह बात लोगों को समझाना बीजेपी के लिए आसान नहीं होगा। कांग्रेस नेताओं की शुरुआती प्रतिक्रिया भी इस बात की पुष्टि करती है कि वे सबसे ज्यादा जोर इसी पहलू पर देंगे। इसके बरक्स बीजेपी का जोर यह बताने पर लगता है कि राहुल गांधी ने अपने बयान से पूरे ओबीसी समुदाय का अपमान किया है।जनता पर किसकी बात का ज्यादा असर होने वाला है, यह साफ होने में थोड़ा वक्त लगेगा। लेकिन जिस तरह से इस प्रकरण ने विपक्ष की तमाम पार्टियों को राहुल गांधी के समर्थन के लिए मजबूर कर दिया है, वह बीजेपी के लिए एक अतिरिक्त चुनौती तो हो ही गया है। इसके अलावा इस पूरे प्रकरण का एक और अहम पहलू है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।ध्यान रहे, राहुल गांधी के जिस बयान को लेकर संसद में गतिरोध का ताजा दौर शुरू हुआ, वह विदेश में दिया गया था और उसका सार यही था कि भारत में लोकतंत्र कमजोर हो रहा है। सरकार के लिए जरूरी था कि वह अपने व्यवहार से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनने वाली इस धारणा को अप्रासंगिक या निरर्थक साबित करे। चिंता की बात यह है कि सही हो या गलत, विपक्षी नेताओं पर कानून व्यवस्था का कसता शिकंजा लोकतंत्र की मजबूती का संदेश नहीं देता।