क्या मध्यप्रदेश सरकार को मैहर वाले बाबा अलाउद्दीन खान का योगदान याद नहीं?

कई बरस पहले की बात है. जानी मानी गायिका शुभा मुद्गल को मैहर में एक कार्यक्रम देना था. मैहर तक का सफर वो मुंबई से तय करने वाली थीं. मोबाइल का दौर नहीं था. तय तारीख पर वो मैहर पहुंच गई. मुसीबत तब हुई जब पता चला कि आयोजन की तारीख को लेकर कुछ भ्रम है. उन्हें स्टेशन पर ‘रिसीव’ करने कोई नहीं आया था.
रात का वक्त था. मैहर स्टेशन सुनसान था. शुभा जी परेशान हुईं. तभी स्टेशन के ही एक कर्मचारी ने आकर उन्हें कहा कि वो कमरे में बैठें और वो जाकर फटाफट आयोजकों को सूचित कर देगा. शुभा जी ने हामी भर दी. कुछ ही देर में वो कर्मचारी आयोजकों को लेकर आया. समस्या का समाधान हो गया. शुभा जी ने चलते-चलते उन्हें शुक्रिया अदा किया, लेकिन इस पर उस कर्मचारी ने जो कहा उसने शुभा जी के बढ़ते कदमों को रोक दिया.
बाबा से मिले मैहन की जमीन को संगीत के संस्कार
उस कर्मचारी ने कहा- कल कार्यक्रम में परज सुना दीजिएगा, बहुत दिन हो गए परज सुने. आगे बढ़े उससे पहले बता दें कि परज एक शास्त्रीय राग है. शुभा जी चौंक गई, उनकी आंखें भर आईं. उनके जेहन में सिर्फ एक ही बात थी कि बाबा मैहर की जमीन को संगीत के क्या कमाल संस्कार देकर गए. बाबा यानी उस्ताद अलाउद्दीन खान. मैहर घराने के संस्थापक. भारत रत्न पंडित रविशंकर के गुरू. उस्ताद अली अकबर खां और विदुषी अन्नपूर्णा देवी के पिता. बाबा के शिष्यों की फेहरिस्त लेकर बैठेंगे तो काफी समय और लगेगा, लेकिन वो अभी नहीं क्योंकि आज मुद्दा कुछ दूसरा है.
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आज मुद्दा ये है कि मध्य प्रदेश सरकार ने मैहर के मंदिर की समिति से दो मुस्लिम कर्मचारियों को निकालने का फैसला किया है. इस फैसले के बाद पहला सवाल यही आया कि ये मैहर तो बाबा का है या यूं कहें कि बाबा मैहर के हैं. मैहर की हवा मेें, पानी में बाबा हैं. बाबा भी तो मुस्लिम था, लेकिन देवी के साधक थे. जन्म से लेकर संगीत में नाम कमाने तक यहां-वहां घूमते रहे. लेकिन जाकर बसे मैहर में, मैहर को ही घर बना लिया. आज उसी मैहर में मंदिर से मुस्लिमों को हटाने का फैसला क्यों? ये बाबा अलाउद्दीन खान की सोच नहीं, ये उनके संस्कार नहीं शब्द चोट पहुंचाने वाले हैं लेकिन ये बाबा का मैहर नहीं. बाबा का मैहर ऐसा हो ही नहीं सकता.
मैहर पहुंचना बाबा की नियति में लिखा था
बाबा ऐसे ही मैहर नहीं पहुंच गए थे. ये ऊपरवाले का फैसला था. ये उनकी नियति में लिखा था कि बाबा और मैहर एक दूसरे की पहचान बन जाएंगे. ये संयोग नहीं था कि जब 8 साल की उम्र में संगीत सीखने के लिए बाबा कोलकाता भागे थे तब भी उन्होंने कई रात एक मंदिर में ही बिताई थी. वो धर्म से ऊपर थे, बिल्कुल संगीत की तरह. ध्रुपद गायक गोपाल कृष्ण भट्टाचार्य से सीखने के लिए उन्होंने अपना नाम तक बदलकर तारा प्रसाद कर लिया था. हालांकि गोपाल जी का जल्दी ही निधन हो गया. लेकिन बाबा की संगीत तालीम आगे बढ़ी.
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इसी बीच एक दिलचस्प वाकया हुआ. बाबा को उनके घरवालों ने खोज लिया. घरवालों को लगा कि उनकी शादी करा देंगे तो बात बन जाएगी. गृहस्थी बनी तो अलाउद्दीन घर पर ही रहेंगे लेकिन हो गया उलटा. शादी की रात भी अलाउद्दीन सरगम का रियाज कर रहे थे. बाबा के मैहर पहुंचने से पहले का एक और किस्सा बड़ा जबरदस्त है. उनकी ख्वाहिश थी कि वो वीणा वादक उस्ताद वजीर खान से संगीत सीखें. वजीर खान तानसेन के परिवार से जुड़े हुए थे. वो अलाउद्दीन को सिखाने के लिए तैयार नहीं हुए.
एक रोज वो रामपुर के नवाब साहब के साथ कहीं जा रहे थे. अलाउद्दीन उनके तांगे के सामने लेट गए. उस्ताद वजीर खान को समझ आ गया कि अलाउद्दीन को शागिर्द बनाना ही पड़ेगा. उन्होंने अलाउद्दीन का इम्तिहान लिया. दरबार में रखे सभी साज एक-एक करके उनसे बजवाए, बाबा का हुनर ऐसा था कि उन्होंने उस्ताद का भरोसा जीत ही लिया. इसके बाद उन्होंने उस्ताद वजीर खान से संगीत की बारीकियां सीखीं.
मैहर की सबसे बड़ी पहचान बाबा
बाबा के बारे में ये सारी बातें बतानी इसलिए जरूरी थीं कि इस पूरे घटनाक्रम के बाद ही वो मैहर पहुंचे थे. मैहर के दरबार में संगीतकार बनकर. लेकिन इसके बाद बाबा मैहर के ही होकर रह गए. कहने को मुस्लिम लेकिन मैहर की सबसे बड़ी पहचान. बाबा ने मैहर के लिए क्या नहीं किया, वहां अनाथ बच्चों को संगीत सिखाया, मैहर नाम का एक बैंड बनाया जो अपनी तरह का अनोखा बैंड था. बाद में बाबा ने मैहर कॉलेज ऑफ म्यूजिक की स्थापना की. उनकी रगों में मैहर था और मैहर की रगों में बाबा. आज उसी मैहर में धर्म के आधार पर कोई फैसला हो तो वो चुभता है.
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कुछ महीने पहले की बात है. पंडित रविशंकर की एक बहुत पुरानी क्लिप अचानक बहुत वायरल हुई थी. उस क्लिप में पंडित जी बाबा के घर उनसे मिलने गए थे. बाबा के पैर छूए थे. ये बाबा का सम्मान था. ये उनके संगीत का सम्मान था. उनकी साधना का सम्मान था. अफसोस एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो पंडित रविशंकर को तो अच्छी तरह जानता है लेकिन शायद उस अनुपात में बाबा अलाउद्दीन खान को नहीं. ये अलग बात है कि पंडित रविशंकर की ख्याति से कहीं पहले बाबा उनके बड़े भाई पंडित उदय शंकर के साथ विदेशों में भारतीय नृत्य-संगीत की पहचान बन चुके थे.
ये सच है कि बाबा को गए 50 साल से ज्यादा बीत गए. लोग शायद भूल गए कि मैहर की आत्मा में बाबा हैं. लेकिन सच तो ये भी है कि सरकार बाबा अलाउद्दीन खान की याद में तमाम कार्यक्रम कराने से लेकर उनकी याद में डाक टिकट तक जारी कर चुकी है. उन्हें देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मविभूषण से सम्मानित कर चुकी है. सरकार को तो ऐसे फैसले से बचना चाहिए था जो बाबा की नगरी में मुस्लिमों को अलग निगाह से देखता हो.