कॉटन की प्रीमियम शर्ट, लग्जरी तौलिये और बेहतरीन अंडर गारमेंट, जानते हैं कहां से आती है इसके लिए रूई?

नई दिल्ली: आपने सुना होगा कि अमिताभ बच्चन जिस कपड़े की बनी शर्ट पहनते हैं, उसका कपड़ा हजारों रुपये मीटर आता है। इसी तरह देश की ही एक नामी कंपनी के बने शर्ट कई हजार रुपये में मिलते हैं। अंडर गारमेंट बनाने वाली एक अमेरिकी कंपनी के प्रोडक्ट पांच सौ रुपये के बिकते हैं। फर वाले लग्जरी तौलिए बनाने वाली एक कंपनी अपने बाथ टॉवेल हजारों रुपये में बेचती है। जानते हैं, इन सब अपेरल के लिए रूई कहां से आती है। ये रूई आती है अमेरिका से। अमेरिकी रूई का क्यों होता है आयातअपेरल इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का कहना है कि अमेरिकी रूई गुणवत्ता में बेहद उम्दा होती है। उस रूई की लैंग्थ, स्ट्रेंग्थ और ड्यूरेबिलिटी, सब बेहतरीन होती है। इसलिए दुनिया भर में फ्रैबिक बनाने के लिए रूई अमेरिका से ही लाई जाती है। भारत में भी हर साल 12 लाख बेल्स (एक बेल में 220 किलो) होता है। इसमें से करीब 30 फीसदी रूई अमेरिका से आती है।अमेरिकी रूई पर लग गई है ड्यूटीभारत में पहले अमेरिका से शुल्क मुक्त रूई का आयात होता था। लेकिन साल 2021 के बजट में इस पर 10 फीसदी का आयात शुल्क लगा दिया गया है। इस समय इस पर 10 फीसदी का आयात शुल्क और कुछ उपकर आदि मिला कर करीब 11 फीसदी का शुल्क लग रहा है। इससे यार्न बनाने वालों और फैब्रिक बनाने वालों का रॉ मैटेरियल महंगा हो गया है। भारतीय अपेरल इंडस्ट्री की मांग है कि इस ड्यूटी को खत्म किया जाए।कॉटन यूएसए भी यही चाहता हैअमेरिका के कॉटन काउंसिल इंटरनेशन या कॉटन यूएसए के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर ब्रूस एथरले का कहना है कि भारत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री तेजी से बढ़ रही है। अनुमान है कि साल 2025 तक यह बढ़ कर 350 अरब डॉलर की हो जाए। लेकिन यहां गुणवत्ता पूर्ण रूई का पर्याप्त उत्पादन नहीं हो पाता है। इसके उलट अमेरिका में इस तरह की रूई की अधिकता है। भारतीय कॉटन एंड अपेरल इंडस्ट्री इसका लाभ उठा सकता है।सहयोग बढ़ाने के लिए आयोजित हो रहा है कार्यक्रमकॉटन काउंसिल इंटरनेशनल के सहयोग से दिल्ली में कल वीविंग थ्रेड्स ऑफ यूनिटी बिटविन यूएस कॉटन एंड इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री नाम से एक कार्यक्रम का आयोजन हो रहा है। इसमें इंडस्ट्री से जुड़े लोगों के अलावा भारत सरकार के भी वरिष्ठ अधिकारी शामिल हो रहे हैं। भारत में भी खूब होता है कपास का उत्पादनभारत में भी रूई या कपास का खूब उत्पादन होता है। पूरी दुनिया में जितनी रूई का उत्पादन होता है, उसमें से करीब एक चौथाई रूई का प्रोडक्शन भारत में ही होता है। रूई उगाने में करीब 60 लाख किसान लगे हुए हैं। लेकिन भारतीय रूई का रेशा छोटा होता है। जबकि अमेरिकी रूई का रेशा लंबा होता है। इसलिए की पहली पसंद अमेरिकी रूई होती है।