दिल्ली, रामपुर, गुजरात… कहीं कन्‍फ्यूज तो नहीं हो गए हैं मुसलमान, मन किधर है!

नई दिल्‍ली: भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने गुजरात विधानसभा चुनाव में एक भी मुस्लिम कैंडिडेट नहीं खड़ा किया था। वह 2002 से ऐसा नहीं कर रही है। यह और बात है कि भगवा पार्टी ने राज्‍य के मुस्लिम बहुल इलाकों में भी जीत दर्ज () की। दिल्‍ली एमसीडी चुनाव (MCD Elections 2022) में भी यह बात देखने को मिली। कई मुस्लिम डोमिनेटेड एरिया में बीजेपी कैंडिडेट विजयी हुए। रामपुर चुनाव में तो इतिहास ही बन गया। पहली बार यहां कोई गैर-मुस्लिम विधायक बना। इन नतीजों ने चुनावी पंडितों को भी चक्‍कर में डाल दिया। पारंपरिक तौर पर मुसलमानों को बीजेपी का वोटर नहीं माना जाता है। ऐसे में बीजेपी का मुस्लिम बहुल इलाकों में भी सीट निकाल लेना चौंकाता है। सवाल उठना लाजिमी है। बीजेपी ने चुनावी जीत का वो कौन सा फॉर्मूला खोज निकाला है कि मुस्लिम बहुल इलाकों में भी उसका परचम फहराने लगा है। कहीं मुस्लिम कन्फ्यूज तो नहीं हो गए हैं? उनका मन किधर है? अगर यह बीजेपी की स्‍ट्रैटेजी है तो कैसे यह सफल साबित हो रही है? आइए, यहां इन पहलुओं को समझने की कोशिश करते हैं।

उदाहरण से समझिए हुआ क्‍या?
बात शुरू करते हैं गुजरात से। इसके लिए उदाहरण लेते हैं दरियापुर का। यह मुस्लिम बहुल सीट है। इस सीट पर कांग्रेस 10 साल से जीतती आ रही थी। इस सीट से कांग्रेस ने गियासुद्दीन शेख को उतारा था। हालांकि, वह बीजेपी के कौशिक जैन से हार गए। गुजरात के कम से कम 16 मुस्लिम बहुल इलाकों में आम आदमी पार्टी (AAP) ने भी अपने कैंडिडेट उतारे थे। लेकिन, कोई भी जीत दर्ज कर पाने में सफल नहीं हुआ। AAP के मैदान में उतरने से जो डैमेज हुआ अब उसे समझते हैं। आप के साथ असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम ने मुस्लिम वोटों को स्प्लिट कर दिया। यानी पारंपरिक तौर पर जो वोट पहले कांग्रेस को जाते थे वे बंटकर तीन पार्टियों में गए। आप, एआईएमआईएम और कांग्रेस। इस तरह मुस्लिम वोट का मतलब नहीं रह गया। एआईएमआईएम ने ज्‍यादातर उन जगहों पर अपने कैंडिडेट उतारे जहां मुस्लिम आबादी का घनत्‍व ज्‍यादा है। इसने कुछ किया या नहीं, वोट जरूर काटे।

मुस्लिमों के पास ज्‍यादा विकल्‍प, ताकत बंटी
मुस्लिम वोटरों की सबसे बड़ी ताकत आज खत्‍म हो चुकी है। यह ताकत थी एकमुश्‍त वोट की। मुस्लिमों के पास विकल्‍प तो बढ़े हैं। लेकिन, ताकत घट गई है। पारंपरिक तौर पर मुस्लिम किसी एक पार्टी को वोट करते थे। यह वोटिंग अक्‍सर ‘टैक्टिकल’ होती थी। जिस तरफ भी ये वोटर घूम जाते थे, वही पार्टी चमक जाती थी। लेकिन, अब ऐसा होता नहीं दिख रहा है। कह सकते हैं कि वे कन्‍फ्यूज हैं। मुस्लिम वोटर कांग्रेस, आप, एआईएमआईएम में से किसी एक को चुन नहीं पा रहे हैं। बीजेपी के मुकाबले में जब ये तीनों खड़े होते हैं तो मुस्लिमों का वोट स्पिलिट हो जाता है। यह मुस्लिम वोटर के वोटों की तासीर को घटा देता है। दिल्‍ली, गुजरात के मुस्लिम बहुल इलाकों के साथ रामपुर में अगर बीजेपी जीती तो यह फैक्‍टर बेहद अहम है।

कोई भी पार्टी मुस्लिम वोटर का भरोसा नहीं जीत पा रही है
मुस्लिम वोटरों के असमंजस में होने की एक और वजह है। कोई भी पार्टी उसका भरोसा नहीं जीत पा रही है। एआईएमआईएम को छोड़ दें तो कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और आप तीनों सॉफ्ट हिंदुत्‍व के मुद्दों को उठाते हैं। इनके नेता मंदिरों में पूजा और घरों में हवन करते दिखते हैं। इनके साथ हिंदू पहचान भी जुड़ी हुई है। दूसरे शब्‍दों में कहें तो हिंदू वोटरों से ये कभी सिरे से किनारा करते नहीं दिखते हैं। यह मुस्लिमों को किसी एक को चुन पाने में मुश्किल पैदा करता है।

बीजेपी की तरफ शिफ्ट हुआ है दलित वोटर
बीजेपी की ताकत हिंदू वोटों का कंसोलिडेशन है। इसमें भगवा पार्टी पूरी तरह सफल हुई है। यहां समझने के लिए रामपुर का उदाहरण लेते हैं। कभी यहां बहुजन समाज पार्टी (BSP) बड़ी ताकत हुआ करती थी। लेकिन, यह धीरे-धीरे कमजोर होती गई। पार्टी का पूरा वोट बीजेपी की तरफ शिफ्ट हुआ। इसने मुस्लिम वोट की रेलिवेंसी खत्‍म कर दी। वहीं, बीजेपी ने इस वोट बैंक के लिए पूरी ताकत झोंक दी। इस दौरान भगवा पार्टी ने बड़े ओबीसी वर्ग को भी अपने पाले में किया। मुस्लिम बहुल इलाकों में भी बीजेपी जीत का झंडा फहरा रही है तो इसके पीछे यह बड़ी वजह बन गई है।

मुस्लिम वोट की हैसियत क्‍या?
सच यह है कि मुस्लिम वोट की हैसियत आज न किसी को जिताने की बची है न किसी को हराने की। इसका कारण यह है कि उसमें क्‍लैरिटी नहीं है। कई राजनीतिक दलों में वो उलझ गए हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि मुस्लिम महिलाएं भी कई मुद्दों पर बीजेपी को वोट करने लगी हैं। इनमें ट्रिपल तलाक जेसे मुद्दे शामिल हैं। महिलाएं देश की आबादी का आधा हिस्‍सा हैं। उन्‍हें किसी भी तरह से कमतर आंका नहीं जा सकता है। इसी बात का एहसास करते हुए कांग्रेस ने यूपी में महिलाओं पर बड़ा दांव लगाया था। उसने ‘लड़की हूं लड़ सकती हूं’ का नारा देकर यूपी चुनाव में 40 फीसदी टिकट महिलाओं को दिए थे। मुस्लिम महिलाओं के वोट को बीजेपी कुछ हद तक खींच पाने में सफल हुई है।