मध्य प्रदेश में गेहूं की सरकारी खरीद कम होने पर कांग्रेस नेता जीतू पटवारी ने उठाया सवाल, मोहन सरकार को जमकर घेरा

मध्य प्रदेश में गेहूं की सरकारी खरीद जारी है, लेकिन बीते वर्षों के मुकाबले इस बार खरीदारी कम है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने गेहूं की खरीदी में कमी आने पर मोहन सरकार को घेरा है और तंज कसा है कि कई बार कृषि कर्मण अवार्ड जीतने वाला राज्य, आखिर गेहूं खरीदी में क्यों पिछड़ गया। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पटवारी ने गेहूं की कम खरीदी को लेकर मोहन सरकार पर हमला बोला और एक्स पर लिखा, मुख्यमंत्री मोहन यादव, कृषि विशेषज्ञों का मानना है गेहूं के फसल चक्र के दौरान कोहरे व हवा के कारण इसकी प्रति एकड़ उत्पादकता पांच क्विंटल तक कम हो गई है। दूसरा सबसे बड़ा दोष मध्य प्रदेश का है। अपने यहां अभी तक पिछली बार से करीब 22.67 लाख टन कम खरीद हुई है। अब तो देश भी जानना चाहता है कि ऐसा क्यों हुआ? कई बार, कृषि कर्मण पुरस्कार जीतने वाला मध्यप्रदेश गेहूं की खरीद में क्यों पिछड़ गया? क्या किसानों को अब भाजपा की खरीद व्यवस्था पर विश्वास नहीं रहा?पटवारी ने आगे कहा, मैं जानता हूं कि आप इसका जवाब नहीं देंगे। लेकिन, प्रदेश की जनता और मेहनतकश किसान जानता है कि सच क्या है? घोषित समर्थन मूल्य से सरकार का मुकर जाना, इसकी सबसे बड़ी वजह है। बीते विधानसभा चुनाव में 2700 रुपए प्रति क्विंटल के वादे को ‘मोदी की गारंटी’ बताने के बावजूद किसानों को धोखा दिया गया। इसीलिए सरकार के बयान से ज्यादा किसानों ने बाजार पर भरोसा कर लिया।गेहूं के बढ़ते दामों को लेकर पटवारी ने कहा, गेहूं एक साल में 8 प्रतिशत महंगा हुआ है। पिछले 15 दिन में ही कीमतें सात प्रतिशत बढ़ चुकी हैं, जो अगले 15 दिन में सात प्रतिशत और बढ़ सकती है। दरअसल, गेहूं के सरकारी भंडारों में हर वक्त तीन महीने का स्टॉक (138 लाख टन) होना चाहिए। मगर इस बार खरीद सत्र शुरू होने से पहले यह सिर्फ 75 लाख टन था।कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पटवारी ने गेहूं के बढ़ते दामों को लेकर कहा, पिछले 15 दिनों में गेहूं के दाम में सात प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है। बाजार में गेहूं 2600-2700 रु. क्विंटल है। ऐसे में 15 दिन में दाम तीन रुपए बढ़ सकते हैं। महंगा गेहूं खरीदकर बना आटा 30-31 रु. किलो ही बेचना पड़ेगा। अभी यह 28 रु. है। मुनाफे की नीति पर चलने वाला बाजार अब अपनी शर्तों पर गेहूं और आटे की कीमत तय करेगा और इसका सबसे बड़ा खामियाजा देश की गरीब जनता को भुगतना पड़ेगा।