यूपी की राजनीति में अकेली पड़ती जा रही है कांग्रेस? सबसे बड़े राज्य में सबसे बड़े विपक्षी दल का क्या होगा भविष्य

लखनऊ: बसपा प्रमुख ने यूपी में ‘एनडीए’ और ‘इंडिया’ दोनों के साथ में गठबंधन से इनकार कर दिया है। वहीं छोटे दल पहले से भाजपा और सपा जैसे दलों के साथ दो खेमों में बंटते जा रहे हैं। अब सवाल ये उठ रहा है कि कांग्रेस के पास यूपी में क्या विकल्प बचे हैं? क्या वह यूपी की राजनीति में अकेली पड़ती जा रही है? यूं तो कांग्रेस देश भर में भाजपा के खिलाफ सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है। आने वाले लोकसभा चुनाव में ‘एनडीए’ के खिलाफ ‘इंडिया’ का विकल्प देने में कांग्रेस अहम भूमिका में है लेकिन यूपी में आकर यह कवायद फंसती जा रही है। अलग-अलग राज्यों में अलग गणित है। यूपी में खासतौर से लगातार खराब प्रदर्शन कर रही कांग्रेस का अगला कदम क्या होगा? इसको लेकर कांग्रेस ने अभी तक कुछ स्पष्ट नहीं किया है। यूपी सबसे बड़ा राज्य है जहां 80 लोकसभा सीटें हैं। ये किसी भी गठबंधन के लिए अहमियत रखती हैं। पिछले चुनावों में कांग्रेस का जो प्रदर्शन रहा है, वही उसके लिए सबसे बड़ी मुश्किल है। कांग्रेस ने 2014 का चुनाव आरएलडी के साथ मिलकर लड़ा था। इसमें उसे 7.5 प्रतिशत वोट मिले थे और रायबरेली व अमेठी की दो सीटें जीती थीं। इन दोनों सीटों पर तब सपा ने उम्मीदवार नहीं उतारा था। वहीं 2019 में कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ा तो कांग्रेस को यहां 6.36 प्रतिशत वोट मिले और सिर्फ एक रायबरेली की सीट जीत सकी थी। यहां सपा-बसपा ने अपना प्रत्याशी नहीं उतारा था। वहीं अमेठी में सपा-बसपा गठबंधन की ओर से बसपा के प्रत्याशी को टिकट मिला था और राहुल गांधी हार गए थे।सीट बंटवारे को लेकर दुविधाऐसी हालत में कांग्रेस यहां अकेले बहुत कुछ करने में सक्षम नहीं है। उसे साथी की तलाश है। हालांकि इंडिया की बैठकों में सपा प्रमुख अखिलेश यादव और आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी साथ खड़े दिखते हैं लेकिन बात जब यूपी की आती है तो जो कांग्रेस की हालत है, उसमें सीटों के बंटवारे को लेकर बात फंसेगी। यहां विपक्ष में सबसे बड़ी पार्टी सपा ही है। आरएलडी और अन्य छोटे दल भी साथ में हैं। ऐसे में वह कांग्रेस को बहुत ज्यादा सीटें नहीं देना चाहेंगे। कांग्रेस की दुविधा ये है कि यूपी में सबसे ज्यादा सीटें हैं, यहां चुनाव ही नहीं लड़ेगी तो देश में उसकी विपक्ष की लीडरशिप पर भी सवाल खड़े होंगे। छोटे दल उसके ही साथ जाएंगे जो मजबूत होगा। की ऐसी स्थिति है नहीं।अंदरूनी समर्थन का विकल्पसूत्रों का कहना है कि चुनाव पूर्व गठबंधन की बजाय वह सपा के साथ आपसी समझौता कर सकती है। पिछले चुनावों की तरह प्रत्याशी न देकर रायबरेली, अमेठी सहित कुछ अन्य सीटों पर सपा अंदर से समर्थन दे सकती है। वहीं कांग्रेस भी सपा के मजबूत गढ़ में प्रत्याशी न देकर अंदर से समर्थन दे सकती है। वजह ये कि यह समझौता बना रहेगा तो चुनाव बाद गठबंधन में इसका लाभ कांग्रेस को मिल सकता है।