चीन का काम खत्‍म! क्‍या भारत से अपने बाजार बचा पाएगा ड्रैगन? कहानी उलट गई है

नई दिल्‍ली: चीन की कहानी बिगड़ चुकी है। अपने शेयर बाजारों में जान फूंकने के लिए उसने पूरी ताकत झोंक दी है। लेकिन, उसे अब तक कामयाबी हाथ नहीं लगी है। उसकी अर्थव्‍यवस्‍था की बिगड़ती सेहत की ओर इशारा कर रहे हैं। 2023 में ड्रैगन के ने 15 फीसदी नुकसान झेला है। इस दौरान विदेशी निवेशकों ने उसके शेयरों में ताबड़तोड़ बिकवाली की। दुनिया को इसमें चीन की स्‍टोरी का ‘द एंड’ होता दिखता है। लेकिन, आपको अंदाजा है कि इस पूरी कहानी में फायदा उठाने वाला सबसे बड़ा किरदार कौन है? कोई और नहीं वह भारत है। भारतीय शेयर बाजार इसी दौरान 20 फीसदी उछल गए। इस कामयाबी में विदेशी निवेशकों की बड़ी हिस्‍सेदारी रही। उन्‍होंने हमारे बाजारों में दिल खोलकर पैसा लगाया। इस दौरान उन्‍होंने 21 अरब डॉलर से ज्‍यादा की खरीदारी की। पिछले साल शेयर बाजार में शायद जो कुछ हुआ वह चीनी सरकार को पसंद नहीं आया है। उसे लगा कि वह भारत से हार रही है। इसलिए उसने सारे तिकड़म लगाने शुरू कर दिए। हाल ही में उसने स्टॉक ट्रेडिंग पर टैक्स आधा कर दिया है। चीनी सरकार चाहती है कि ज्‍यादा लोग निवेश करें। बैंकों को अपने पास कितना पैसा रखना होगा, इस लेकर उसके सेंट्रल बैंक ने नियमों में ढील दी। इसका मतलब है कि बाजार में ज्‍यादा पूंजी उपलब्ध हो। सबसे बड़ा कदम क्‍या उठाया?सरकार समर्थित चीनी कंपनियों या जिन्हें जानकार ‘नेशनल टीम’ कहते हैं, उन्हें भी बाजारों में निवेश करने के लिए प्रोत्‍साहित किया गया है। उन्होंने पिछले महीने में लगभग 10 अरब डॉलर मूल्य के चीनी शेयरों में निवेश किया है। यह सब बाजार को सहारा देने के लिए किया गया है। सवाल यह है कि क्या चीन का सरकारी हस्तक्षेप उसके शेयर बाजार को बचा पाएगा? अगर आप पीछे यानी 2015 में जाएंगे तो आपको लगेगा कि इसका जवाब ‘हां’ है। उस समय भी CSI 300 क्रैश हुआ था। इसे उबारने के अंतिम प्रयास में चीनी सरकार ने पहली बार ‘नेशनल टीम’ का गठन किया था। उन लोगों ने बाजार में जमकर पैसा लगाया। चीनी शेयर बाजार की लगभग 6 फीसदी हिस्‍सेदारी खरीद ली गई। साल के अंत तक CSI 300 ने अमेरिकी S&P 500 से बेहतर प्रदर्शन किया था।जब चीनी सरकार समर्थित कंपनियों ने शेयर बाजार में निवेश किया तो इसने अन्य निवेशकों को एक मैसेज दिया। मैसेज था- अगर सरकार इन शेयरों पर अपना पैसा लगाने को तैयार है तो वे क्यों नहीं? उनके निवेश से बाजार में लिक्विडिटी में भी सुधार हुआ। नतीजा यह हुआ कि शेयरों की कीमतें छोटी अवधि में स्थिर हो गईं।क्‍या 2015 में जो काम आया वह 2024 में भी काम करेगा? यही कारण है कि ‘नेशनल टीम’ फिर से एक्टिव है। लेकिन, हर कोई इस बात से सहमत नहीं है कि जो 2015 में काम आया वह चीन में 2024 में भी काम करेगा। दरअसल, चीन की अर्थव्यवस्था उस समय काफी मजबूत स्थिति में थी। यह केवल शेयर बाजार का बुलबुला था जो फूट गया था। लिहाजा, निवेशक भी बुलबुला फूटने के बाद वापस आने को इच्छुक थे। हालांकि, आज हालात वैसे नहीं हैं। चीन के सख्त लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था को चरमरा कर रख दिया है। बेलगाम निर्माण गतिविधि के कारण चीनी रियल एस्टेट डेवलपर्स डिफॉल्‍ट के कगार पर हैं। यहां तक कि चीनी उपभोग का भविष्य खतरे में है। यह सबकुछ इशारा करता है कि निवेशक चीनी कंपनियों के शेयर बेच रहे हैं। उन्हें आज चीन में वास्तविक आर्थिक समस्या का एहसास हो रहा है। निवेशक सरकारी हस्तक्षेप को अच्‍छा नहीं मानते हैं। ऐसे में वे दांव लगाने से बचेंगे। साथ ही उन्हें इस बात की भी चिंता हो सकती है कि जब सरकार इन शेयरों से बाहर निकलने का फैसला करेगी तो क्या होगा? इससे फिर बाजार औंधे मुंह गिर सकते हैं। चीन की ‘नेशनल टीम’ को अपने बाजारों में स्थिरता लाने के लिए अब तक किए गए प्रयासों से लगभग तीन गुना ज्‍यादा ताकत लगानी होगी। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो इसका मतलब साफ होगा। विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों की ओर कूच करना जारी रखेंगे। विदेश के बड़े कारोबारी घराने पहले से ही भारतीय बाजारों पर फिदा हैं। जब उनका पैसा आएगा तो यह हमारे बाजार को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है।