जगन मोहन रेड्डी को गढ़ में घेर रहे चंद्रबाबू नायडू, पढ़ें आंध्र प्रदेश की ग्राउंड रिपोर्ट

विशाखापत्तनम: आंध्र प्रदेश की लड़ाई मौजूदा सीएम ए एस जगनमोहन रेड्डी और पूर्व सीएम और चंद्रबाबू नायडू के बीच है। हालांकि टीडीपी बीजेपी व जनसेना के साथ मिलकर एनडीए गठबंधन के तौर पर वाईएसआर कांग्रेस और सीएम जगन मोहन रेड्डी को घेर रहे हैं। अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए जहां एक ओर जगन मोहन राज्यभर में दौरे कर रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर पूर्व सीएम चंद्रबाबू नायडू अपने बेटे नारा लोकेश के साथ मिलकर राज्यभर के युवाओं के लिए संवाद कार्यक्रम युवा गालम के जरिए लोगों के बीच पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। गौरतलब है कि जहां आंध्र प्रदेश का रायलसीमा इलाका वाईएसआर कांग्रेस का मजबूत गढ़ बना हुआ है तो वहीं सेंट्रल व कोस्टल आंध्र टीडीपी के साथ दिख रहा है। 2019 से पहले नायडू सरकार के खिलाफ की गई अपनी पदयात्राओं के जरिए जहां जगन ने आंध्र प्रदेश की जनता के मन में जगह बनाने में कामयाब रहे और 2019 में सत्ता में आ गए तो वहीं इस बार वह जमीन पर अपने सरकार के किए गए कामों के भरोसे सत्ता बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जगन और एनडी के इस लड़ाई का तीसरा कोण इस बार कांग्रेस बन रही है। वाईएस शर्मिला के सहारे प्रदेश में कई संसदीय सीटों से लेकर असेंबली सीटों पर कांग्रेस ने मुकाबले को तिकोना बनाने की पूरी कोशिश की है। टीडीपी के सहारे बीजेपी भी यहां अपनी पैठ जमाने की कोशिश कर रही है तो वहीं तेलुगु सिनेमा के सुपरस्टार कहे जाने वाले पवन कल्याण व उनकी जन सेना पार्टी भी प्रदेश की सियासत में अपनी पैठ बनाने में जुटी है।लोकप्रिय योजनाओं के सहारे जगन की कुर्सी बचाने की कोशिशसत्ता की इस लड़ाई में जगन अकेले दिख रहे हैं। एक तरफ जहां बीजेपी-टीडीपी की तिकड़ी उनके खिलाफ खड़ी है तो वहीं कांग्रेस के हाथ पकड़कर खुद उनकी अपनी बहन वाईएस शर्मिला उन्हें उनके गढ़ से लेकर राज्यभर में घेरने में लगी हुई हैं। वाईएसआर कांग्रेस को कुछ सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन वह अपनी कल्याणकारी योजनाओं पर भरोसा कर रही है, खासकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में उसका जोर है। जगन अपनी लड़ाई अपनी बुजुर्ग पेंशन, अम्मावोडि व वाईएसआर चेटायु जैसी तमाम तरह की सरकारी योजनाओं के भरोसे लड़ रहे हैं, जहां राज्यभर में फैले लगभग दस हजार से वॉलिटियर्स के सहारे तमाम सरकारी योजनाएं जरूरतमंदों के दरवाजे तक पहुंचाई जा रही हैं। जगन वॉलिटियर्स स्कीम को लोगों के बीच अपनी पकड़ और पहुंच का एक मजबूत आधार की तरह देख रहे हैं। गौरतलब है कि लोगों में नाराजगी है, लेकिन गांवों में और आर्थिक रूप से कमजोर तबके में जगन की योजना उनके पक्ष में माहौल बनाती दिख रही है। वहीं जगन एससी, एसटी व अल्पसंख्यकों को भी टारगेट कर काम कर रहे हैं। खासकर रायलसीमा का इलाका अभी भी मजबूत गढ़ जैसा दिख रहा है। वहीं जगन ने प्रदेशभर में अपनी पैठ बढ़ाने के लिए आंध्र विभाजन के बाद राज्य के बचे हुए 13 जिलों में बढ़ोतरी करते हुए राज्य की सभी 25 संसदीय सीटों को जिला में तब्दील करने का जो फैसला किया, उसे वह अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। सत्तारूढ़ दल को लगता है कि उनकी सरकार ने विकेंद्रीकरण करते हुए जिले बढ़ाने की जो कवायद की है, उससे हर जिले के लोगों की आकांक्षाएं जागी हैं। यह लोगों के बीच भावनात्मक मुद्दे की तरह काम करेगा।जगन से सत्ता छीनने के लिए एनडीए हुआ गोलबंदजगन को सत्ता से छीनने के लिए टीडीपी, बीजेपी व जनसेना पार्टी आपस में मिल गए हैं। दरअसल, टीडीपी-बीजेपी व जेएसपी 2024 में 2014 दोहराना चाहते हैं, जब प्रदेश बंटवारे से नाराज आंध्र ने कांग्रेस के खिलाफ इस गठबंधन को जिताया था, जहां टीडीपी ने 175 विधानसभा सीटों में से 102 सीटें जीती थीं, जबकि बीजेपी ने चार सीटें जीतीं। जेएसपी चुनाव में नहीं उतरी थी, लेकिन उसने बाहर से समर्थन दिया। जगन के विरोधी महंगाई, बेरोजगारी, निवेश में कमी और विकास का थमना और राजधानी के मुद्दे सहित कई मोर्चों पर सरकार को घेर रहे हैं। गठबंधन का जमीनी आधार सेंट्रल आंध्र से लेकर कोस्टल आंध्र तक मजबूत दिख रहा है। जहां जगन की पैठ गांवों में दिखती है तो वहीं टीडीपी का आधार शहरी इलाके में मजबूत नजर आता है। इसलिए टीडीपी बेराेजगारी व महंगाई के मुद्दे को प्रमुखता से उठा रही है। साथ ही, एनडीए खासकर टीडीपी ने जगन के खिलाफ आंध्र प्रदेश जमीन मालिकाना हक कानून को भी लेकर घेरना शुरू किया है। टीडीपी का आरोप है कि इसके जरिए सरकार लोगों की जमीन हथियाना चाहती है। पार्टी का दावा है कि अगर वह सरकार में आती है तो इस कानून को निरस्त करेगी। ऐसे में यह मुद्दा भी बड़ा बन रहा है।राजनीतिक तौर पर अभी भी हाशिए पर कांग्रेसआंध्र प्रदेश की इस लड़ाई में कांग्रेस भले ही तीसरी कोण बनने की कोशिश कर रही है, लेकिन राज्य में उसका जमीनी आधार छिन्न भिन्न है। कांग्रेस ने अपनी ताकत संजोने के लिए यहां जगन मोहन रेड्डी की बहन वाईएस शर्मिला को न सिर्फ अपना चेहरा बनाया, बल्कि वह कडपा से चुनाव भी लड़ रही हैं। वाईएसआर कांग्रेस व एनडीए की लड़ाई में कांग्रेस ने कई जगह पर मुकाबले को तिकाेना बनाती दिख रही है। लोग मानते हैं कि आंध्र प्रदेश के बंटवारे को लेकर लोगों के मन में कांग्रेस के प्रति नाराजगी कम जरूर हुई है, लेकिन खत्म नहीं हुई।कांग्रेस को लेकर पूर्व रेलवे कर्मचारी बालाजी का कहना था कि कांग्रेस के प्रति लोगों के ठंडेपन के पीछे पार्टी के पास अच्छे चेहरे या नेताओं का न होना है। तेलंगाना बनने के बाद से पार्टी यहां स्लीपिंग मोड में है। उनका तर्क था कि कांग्रेस के नेता लोगों के बीच आते- जाते नहीं हैं। एक प्राइवेट कंपनी में काम करने वाले श्रीकाकुलम के रघुनाथ का कहना था कि कांग्रेस में संगठन और काडर नहीं बचा है। उसके सभी लोग वाईएसआर कांग्रेस में शिफ्ट हो गए। उनकी मानना था कि शर्मिला अगर कांग्रेस की जगह टीडीपी से खड़ी होतीं तो उनकी जीत तय थी। वहीं शर्मिला अपने भाई की सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार और राजनीतिक हत्या के आरोप लेकर हमलावर हैं। इस चुनाव में कांग्रेस व शर्मिला जगन मोहन के चाचा वाईएस विवेकानंद रेड्डी की हत्या के मुद्दे को लेकर सरकार को घेर रहे हैं।चुनावों से नहीं, भावनाओं से भी जुड़ा है राजधानी मुद्दाचुनाव में एक अहम मुद्दा दिखा, राजधानी का। आंध्र प्रदेश में चित्तूर से लेकर विशाखापत्तनम तक में लोग इसे लेकर अपनी राय रखते दिखे। राज्य के अधिकतर लोग तीन राजधानियों वाली अवधारणा से सहमत नजर नहीं आए। इसे लेकर सबसे तीखी प्रतिक्रिया सेंट्रल आंध्र में दिखी, जहां अमरावती राजधानी के तौर पर विकसित होनी थी। उल्लेखनीय है कि तेलंगाना अलग होने के बाद नायडू सरकार ने अमरावती को राजधानी बनाने का फैसला किया और इस परियोजना पर काम भी चालू हो गया। लेकिन जगन मोहन ने आते ही अमरावती के भव्य पुनर्निर्माण को न सिर्फ रोक दिया, बल्कि सरकार ने ऐलान किया कि राज्य की तीन राजधानियां होंगी – विधायी राजधानी के रूप में अमरावती, प्रशासनिक राजधानी के रूप में विशाखापत्तनम,और न्यायिक के रूप में कुरनूल। आंध्र प्रदेश के लोग इसे एक अव्यवहारिक व गैरजरूरी कदम बताते हैं। लोगों को लगता है कि इससे राजधानी के तौर पर विकसित होने की संभावनाओं पर विराम लग गया है। हालांकि विशाखापत्तनम के लोग भी इसका विरोध करते दिखे।