बजट 2024 : विकास तो ठीक पर रोजगार भी तो बढ़ना चाहिए, जानें क्या हैं आर्थिक चुनौतियां

से पहले सरकार की ओर से रविवार को जारी की गई रिपोर्ट ‘इंडियन इकॉनमी- अ रिव्यू’ में यह उम्मीद जताई गई है कि भारत 2027 तक 5 ट्रिलियन डॉलर और 2030 तक 7 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी बन जाएगा। रिपोर्ट में इसे हासिल होने लायक लक्ष्य बताते हुए उन चीजों का जिक्र किया गया है, जो इसे मुमकिन बना सकते हैं। रिपोर्ट में छिपे पॉजिटिव नजरिये की सराहना करते हुए भी कुछ अहम बिंदुओं पर ध्यान देना जरूरी है, जो इस तरह के लक्ष्य के साथ जुड़े हैं।रोजगार भी बढ़े : दुनिया के बड़े देशों में भारत को सबसे तेज इकॉनमी का दर्जा हासिल है। लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि तेज विकास दर के बावजूद रोजगार के मोर्चे पर खास प्रगति नहीं हुई है। आज भी युवा बेरोजगारी का स्तर 40 फीसदी तक बताया जाता है। यह स्थिति गंभीर इसलिए भी है कि यह तेज विकास दर के फायदों को सीमित करती है। जाहिर है, विकास दर को जारी रखने या और तेज करने के प्रयासों के साथ उसे रोजगारोन्मुख बनाने पर भी ध्यान देने की जरूरत है। खपत कमजोर है: खपत के मोर्चे पर चुनौती अभी बनी हुई है। जानकारों के मुताबिक प्राइवेट फाइनल कंजंप्शन एक्सपेंडिचर (PFCE) मौजूदा वित्तीय वर्ष में 5.2 फीसदी रहने का अनुमान है, जबकि पिछले वित्तीय वर्ष में यह वृद्धि 7.5 फीसदी थी। यह महत्वपूर्ण इसलिए है कि भारत की अर्थव्यवस्था में खपत का योगदान 60 प्रतिशत है। लेकिन आबादी के निचले आधे हिस्से के हाथ में इतना पैसा नहीं बच रहा है कि वह खुलकर खर्च कर सके। अगर यह तबका खर्च बढ़ाएगा तो उससे उत्पादन और सेवाओं की मांग बढ़ेगी। लिहाजा, नए रोजगार पैदा होंगे और तेज विकास का चक्र पूरा होगा। निजी निवेश बढ़े: एक बड़ी चुनौती यह भी है कि निजी पूंजी निवेश में बढ़ोतरी नहीं हो रही है। कोविड-19 के बाद विकास दर में जो बढ़ोतरी देखने को मिली और इकॉनमी नए सिरे से उठ खड़ी हुई उसके पीछे सरकार द्वारा किए गए निवेश की ही प्रमुख भूमिका रही है। लेकिन प्राइवेट इन्वेस्टमेंट में रिवाइवल के बगैर विकास की तेज रफ्तार का टिके रहना मुश्किल होगा। इसलिए इस ओर अभी से ध्यान देना जरूरी है। कृषि क्षेत्र का कमजोर प्रदर्शन : कृषि क्षेत्र के प्रदर्शन में गिरावट लगातार चिंता की बात बनी ही हुई है। खराब मॉनसून की वजह से पिछली तिमाही (जुलाई-सितंबर) में कृषि क्षेत्र की ग्रोथ घटकर 1.2 फीसदी पर आ गई, जो उससे पहले की तिमाही (अप्रैल-जून) में 3.5 फीसदी थी। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में खपत कमजोर होने की एक वजह यह भी है। महिलाओं की कम भागीदारी : लेबर फोर्स में महिलाओं की कम भागीदारी आर्थिक ही नहीं सामाजिक और अन्य दृष्टियों से भी चिंता की बात है। इस मामले में हम पड़ोस के बांग्लादेश और पाकिस्तान से भी पीछे हैं। ध्यान रहे, विश्व बैंक का कहना है कि महिलाओं की वर्कफोर्स में भागीदारी बढ़ाकर ग्रोथ रेट में 1.5 फीसदी तक की बढ़ोतरी की जा सकती है।