बोट क्लब की रैली, देश से यूपी तक सत्ता परिवर्तन और 1991 में तय हो गई राम मंदिर आंदोलन की दिशा

अयोध्या: मेरे प्रभु रामलला 1990 आते- आते पूरी तरह से राजनीतिक मुद्दा बन गए थे। विवादित परिसर में मंदिर का निर्माण होगा या नहीं, यह राजनीतिक रैलियों का मुद्दा बन गया था। मंदिर बनेगा तो कैसे बनेगा? यह सवाल भी उठने लगा था। 1853 और 1934 में मस्जिद को ध्वस्त करने की दो नाकाम कोशिशें हो चुकी थीं। निर्माण की प्रक्रिया शुरू करने 30 अक्टूबर 1990 को पहुंचे रामभक्त कारसेवक गोलीकांड का शिकार हुए थे। कारसेवकों की मौत ने देश के हिंदू समाज को आक्रोशित कर दिया था। मुलायम सिंह सरकार के खिलाफ जनाक्रोश लगातार बढ़ रहा था। कुछ यही हाल केंद्र की वीपी सिंह सरकार का था। 1990 की घटनाओं ने यूपी ही नहीं देश की राजनीति में बड़ा बवाल खड़ा कर दिया था। एक तरफ भारतीय जनता पार्टी हिंदुत्व के एजेंडे के साथ आगे बढ़ रही थी। वहीं, दूसरी तरफ जनता दल की ओर से कांग्रेस के बने- बनाए सामाजिक समीकरण में सेंधमारी शुरू कर दी थी। मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों का राजनीतिक उभार हो चुका था। बीपी सिंह की सरकार ने मंडल कमीशन को लागू कर ओबीसी वर्ग को राजनीतिक तौर पर सजग कर दिया था। ओबीसी वर्ग राजनीतिक तौर पर जागरूक हुआ तो लीडरशिप में भागीदारी की मांग तेज हो गई। इसके साथ ही राम मंदिर का मुद्दा और गहराना शुरू हो गया। भारतीय जनता पार्टी ने जातियों की राजनीति के बीच हिंदू धर्म को आधार पर तमाम वर्गों को जोड़ने की कोशिश शुरू कर दी।1990 की कारसेवकों पर गोलीकांड की घटना ने देश को राजनीतिक तौर पर झकझोड़ दिया था। राम मंदिर का मुद्दा अब आंदोलन से उन्माद की तरफ बढ़ने लगा। अयोध्या में ‘लंका कांड’ की शुरुआत हो चुकी थी। युद्ध का बिगुल बज चुका था। ऐसे में दो बड़ी घटनाएं हुई। पहली देश में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बिहार में लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद अल्पमत में आ गई थी। उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। 10 नवंबर 1990 को विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार गिर गई। जनता दल के दूसरे धड़े के नेता चंद्रशेखर देश के प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए। इस बार चंद्रशेखर को समर्थन कांग्रेस ने दिया। 2 दिसंबर 1989 को बनी वीपी सिंह सरकार अपने एक साल का कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाई। जनता दल में एक और दरार की पटकथा मुलायम- लालू लिख चुके थे। वीपी सिंह की सरकार गिरने के बाद चंद्रशेखर की सरकार बनी, लेकिन यह कांग्रेस की एक सोची- समझी राजनीति थी। दरअसल, कांग्रेस कारसेवकों पर गोलीकांड के कारण भाजपा को किसी राजनीतिक लाभ लेने से वंचित रखना चाहती थी। ऐसे में अयोध्या एक बार फिर राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुका था। मेरे राम पर बड़ी राजनीतिक संघर्ष का यह आरंभ था।वीपी सिंह सरकार का वह कदम1990 में मुलायम सरकार ने 30 अक्टूबर और 2 नवंबर को अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलवा कर देश की राजनीति को बदल दिया। यूपी से देश तक इसका अलग संदेश गया। हालांकि, 1989 में राजीव सरकार के पतन और वीपी सिंह सरकार के गठन के बाद राम एक मुद्दा बन चुके थे। वीपी सिंह सरकार में शामिल भाजपा इस मुद्दे को छोड़ने को तैयार नहीं थी। लालकृष्ण आडवाणी के रथ यात्रा के ऐलान के साथ वीपी सिंह सरकार ने हिंदू- मुस्लिम पक्ष के बीच वार्ता के जरिए मुद्दे का हल निकालने की पहल की। हालांकि, यह कोशिश आगे नहीं बढ़ पाई। ऐसे में वीपी सिंह सरकार ने एक ऐसा आदेश दिया, जिसने मेरे प्रभु राम के मंदिर के बनने की आस दिखने लगी। वीपी सिंह सरकार ने विवादित स्थल के अधिग्रहण का आदेश जारी कर दिया। वीपी सिंह सरकार की ओर से जारी भूमि अधिग्रहण के अध्यादेश का मुस्लिम पक्ष की ओर से जोरदार विरोध शुरू हो गया। वीपी सिंह सरकार ने कदम पीछे खींच लिए। भाजपा ने सरकार के इस कदम को मुस्लिम तुष्टीकरण से जोड़ा।फिर शुरू हुई बातचीत की कोशिशवीपी सिंह सरकार के गिरने के बाद कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर पीएम बने। कांग्रेस की पहल पर 1989 में अयोध्या राम मंदिर का भूमि पूजन हुआ था। ऐसे में कांग्रेस फिर एक्टिव हुई। वीपी सिंह जिस वार्ता की योजना बना रहे थे। हिंदू- मुस्लिम पक्ष को एक राय बनाने के लिए वार्ता के मंच तक जाने की कोशिश की गई। पीएम चंद्रशेखर ने राम मंदिर मुद्दे पर वार्ता के लिए अपनी सरकार में मंत्री सुबोध कांत सहाय और तीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव, भैरों सिंह शेखावत और शरद पवार की एक कमेटी गठित की। इस कमेटी को हिंदू और मुस्लिम पक्ष से वार्ता कर मुद्दे के समाधान की राह निकालने को तैयार किया गया था। सरकार की कमेटी के नेतृत्व में दोनों पक्ष मिले। हिंदू और मुस्लिम पक्ष की ओर से प्रमाणों को पेश किया गया। मुस्लिम पक्ष के प्रतिनिधि इतिहासकारों ने अयोध्या में मौका मुआयना करके दोबारा बातचीत में आने को कहा। 25 जनवरी 1991 को यह वार्ता टूट गई। पीएम चंद्रशेखर के मित्र तांत्रिक चंद्रास्वामी ने अपनी तरफ से पूरा जोर लगा लिया। लेकिन, कोई नतीजा नहीं निकला। इसी दौरान कांग्रेस ने चंद्रशेखर सरकार से समर्थन वापस ले लिया। सरकार गिर गई। बातचीत का सिलसिला खत्म हो गया। इसके बाद अगले तीन दशकों तक राम मंदिर चुनावी और राजनीतिक मुद्दा बनकर चलता रहा।मुलायम ने यूपी में किया खेलदेश में चंद्रशेखर को एक कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर पेश कर कांग्रेस ने अपने चुनावी कैंपेन की शुरुआत कर दी। कांग्रेस देश में आम चुनाव की तैयारी कर ली थी। लेकिन, यूपी में पार्टी मुलायम सरकार से समर्थन वापस लेने की रणनीति पर काम कर रही थी। कांग्रेस की रणनीति थी कि यूपी में मुलायम को अल्पमत की सरकार साबित कर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया जाए। दरअसल, 1989 के यूपी चुनाव में जनता दल यूपी की 425 सीटों वाली विधानसभा में 208 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। कांग्रेस 94 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर रही। भाजपा 57 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर रही थी। मुलायम वीपी सिंह और चौधरी देवीलाल के समर्थन से यूपी में मुख्यमंत्री बन गए। वीपी सिंह सरकार गिरने के बाद मुलायम ने पाला बदला। पीएम चंद्रशेखर के समाजवादी जनता दल का दामन थाम लिया। कांग्रेस के चंद्रशेखर सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद कांग्रेस मुलायम सरकार को भी गिराने की तैयारी में थी।अप्रैल 1990 में एक रात दिल्ली में कांग्रेस ने मुलायम सरकार से समर्थन वापस लेने की रणनीति बनाई। अगले दिन राजभवन को कांग्रेस मुलायम सरकार से समर्थन वापस लेने वाली थी। कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों ने इस मामले की जानकारी मुलायम तक पहुंचा दी। लखनऊ में मुलायम सिंह यादव ने अपने- अपने बंगलों में सो रहे सभी मंत्रियों को जगाया। कैबिनेट की आपात बैठक हुई। ‘बाई सर्कुलेशन’ कैबिनेट से इस प्रस्ताव की मंजूरी ली गई कि मंत्रिपरिषद विधानसभा भंग कर नए विधानसभा चुनाव की सिफारिश करती है। कांग्रेस का खेल खराब हो गया और प्रदेश में चुनाव की तैयारियां शुरू हो गई।दिल्ली के बोट क्लब की वह रैलीचंद्रशेखर सरकार के गिरने के बाद देश में आम चुनावों की घोषणा हो चुकी थी। ऐसे में भाजपा ने राम मंदिर के मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाने का फैसला लिया। राम मंदिर मुद्दे के समाधान के लिए सरकार की ओर से चल रही वार्ता थम चुकी थी। विश्व हिंदू परिषद, आरएसएस और अन्य संगठनों का आक्रोश भड़का। भाजपा की ओर से इस रैली के आयोजन में नरेंद्र मोदी को जोड़ा गया। आडवाणी की रथ यात्रा की तर्ज पर उन्होंने यहां पर भी अपना मैनेजमेंट स्किल दिखाया। 2 और 3 अप्रैल 1991 को वीएचपी के हजारों साधु प्रतिनिधियों और करीब 3 लाख राम भक्तों से दिल्ली पट गई। राजधानी के बोट क्लब में विशाल रैली का आयोजन किया। दिल्ली थम सी गई थी। बोट क्लब की रैली में एक प्रस्ताव पास हुआ।बोट क्लब की रैली में अयोध्या ही नहीं, काशी और मथुरा को भी मुक्त कराने की घोषणा की गई। रैली के बाद एक राजनीतिक बयान जारी किया गया। इसमें हिंदुओं से मुलायम सिंह यादव एवं चंद्रशेखर, राजीव गांधी और वीपी सिंह की तिकड़ी का राजनीतिक तौर पर विरोध करने का अनुरोध किया गया। रैली को साध्वी ऋतंभरा और लालकृष्ण आडवाणी ने भी संबोधन हुआ। इस रैली में आडवाणी ने घोषणा की कि राम की भक्ति देश की ताकत है। हम उस ताकत को छोड़ नहीं सकते। राम की लड़ाई जारी रहेगी। इस रैली में अयोध्या के गोलीकांड में मारे गए कारसेवकों के अस्थि कलश को भी रखा गया था। यह बोट क्लब की रैली में आए लोगों को आक्रोशित कर रहा था।मंडल- कमंडल के बीच कांग्रेस को जीतअक्टूबर- नवंबर 1990 में अयोध्या में जिस प्रकार से कारसेवकों पर गोलियां चली। लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार किया, उसने देश में अलग ही माहौल बना दिया। देश में मंडल कमीशन के बाद की राजनीति के बाद बदले सामाजिक समीकरणों से उपजे नेता राज्यों की कमान संभाल रहे थे। देश की आजादी के बाद बड़े स्तर पर समीकरणों में बदलाव हो रहा था। कांग्रेस से सवर्ण वोट बैंक किनारे हो रहा था। मंडल कमीशन के मुद्दे के बाद ओबीसी वोट बैंट भी छिटका। कांग्रेस की सबसे बड़ी समर्थक मुस्लिम वोट बैंक ने भी 1986 में राम मंदिर का ताला खोलने और 1989 में शिलान्यास कार्यक्रम की मंजूरी से नाराज हो गई। क्षेत्रीय क्षत्रपों के दलों ने इस राजनीति पर अपना कब्जा जमाना शुरू कर दिया। इसके बाद भी कांग्रेस देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनी हुई थी। पावर पॉलिटिक्स में बाउंस बैक करने का दम रखती थी। ऐसे में राजीव गांधी ने चंद्रशेखर सरकार पर जासूसी का आरोप लगाया। चंद्रशेखर सरकार से समर्थन वापस ले लिया गया।चंद्रशेखर सरकार गिरने के बाद देश में मध्यावधि चुनावों की घोषणा हुई। 20 मई से वोटिंग का ऐलान चुनाव आयोग की ओर से किया गया। कांग्रेस ने अपना जोरदार प्रचार अभियान शुरू किया। अल्पसंख्यक वोट बैंक की नाराजगी से चिंतित राजीव गांधी इस बार राम मंदिर के मुद्दे पर कुछ भी बोलने से बचते दिख रहे थे। देश में पहले चरण की वोटिंग के बाद राजीव गांधी प्रचार अभियान के लिए तमिलनाडु के श्रीपेररुंबदूर पहुंचे थे। वहां पर बम विस्फोट में उनकी हत्या कर दी गई। कांग्रेस के प्रति सहानुभूति की लहर का साथ मिला। चुनाव आयोग ने इस घटना के बाद 12 और 15 जून को वोटिंग का ऐलान किया। राजीव हत्याकांड से मंडल और कमंडल दोनों कमजोर हुआ।लोकसभा चुनाव 1991 में कांग्रेस ने 36.26 फीसदी वोट शेयर के साथ 232 सीटों पर जीत हासिल की। हालांकि, कांग्रेस बहुमत के 268 सीटों के आंकड़े से 36 सीट कम रह गई थी। हालांकि, पार्टी ने पर्याप्त बहुमत जुटाया और पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार का गठन हुआ। इस चुनाव में कमंडल का जोर दिखा। अपने तीसरे लोकसभा चुनाव में भाजपा 20.11 फीसदी वोट शेयर के साथ देश की 120 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज करने में कामयाब रही। आठ साल से भी कम समय में पार्टी 2 से 120 तक पहुंच चुकी थी। यह राम मंदिर मुद्दे का परिणाम था। इस चुनाव में जनता दल 59 और माकपा 35 सीटों पर जीत दर्ज करने में कामयाब रही।यूपी में तो मुद्दा केवल जय श्रीरामदेश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार के रामभक्त कारसेवकों के गोलीकांड के मामले को जोरदार तरीके से उठाते हुए चुनावी मैदान में उतरी। 1989 में बनी मुलायम सिंह सरकार का पतन होने के बाद 1991 के चुनाव का मुद्दा श्रीराम रहे। 425 में से यूपी की 419 सीटों पर चुनाव हुआ। भाजपा ने 415 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। पार्टी ने 221 सीटों पर जीत दर्ज कर पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली। इस चुनाव में भाजपा को 164 सीटों का लाभ हुआ और वोट प्रतिशत में 19.84 फीसदी का इजाफा देखने को मिला। मुलायम के नेतृत्व में उतरी जनता दल को 92 सीटें मिली। कांग्रेस 46, जनता पार्टी 34, बहुजन समाज पार्टी 12 सीटों पर जीत दर्ज कर पाई। एक प्रकार से यह चुनाव लिखने वाली साबित हुई।