लोकसभा में BJP का ही होगा स्पीकर! सहयोगियों को समझाने की चुनौती, जानें नीतीश-नायडू को कैसे मनाने में मिलेगी सफलता

पटनाः नरेंद्र मोदी के तीसरी बार पीएम बनने के बाद संसद का सत्र 24 जून से शुरू होगा। सात दिनों तक चलने वाले इस सत्र में पहले प्रोटेम स्पीकर का चयन होगा। फिर प्रोटेम स्पीकर नवनिर्वाचित 18वीं लोकसभा के सदस्यों को शपथ दिलाएंगे। शपथ ग्रहण पूरा होने के बाद लोकसभा के स्थायी स्पीकर का चुनाव होगा। पहले दो बार स्पीकर का पद भाजपा के कोटे में रहा है। इस बार भाजपा को बहुमत नहीं मिला है। इसलिए नए स्पीकर को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।सुमित्रा महाजन और ओम बिड़ला रहे स्पीकर नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल में सुमित्रा महाजन लोकसभा की स्पीकर थीं। उनका कार्यकाल 6 जून 2014 से 17 जून 2019 तक रहा। दूसरे कार्यकाल में ओम बिड़ला को भाजपा ने स्पीकर बनाया। उनका चयन 17वीं लोकसभा के लिए 19 जून 2019 को हुआ था। दोनों बार भाजपा को अपने ही किसी सदस्य को स्पीकर बनाने में किसी से सलाह-मशविरे या मदद मांगने की जरूरत महसूस नहीं हुई। इसलिए कि दोनों बार भाजपा के पास बहुमत के आंकड़े से अधिक सांसद थे।मोदी के दो कार्यकाल में भाजपा के स्पीकर रहे पीएम मोदी के दो कार्यकाल में स्पीकर भाजपा का ही रहा। पहली बार 2014 में भाजपा के सांसदों की संख्या 282 थी तो दूसरी बार सदन में 303 सदस्य भाजपा के थे। हालांकि दोनों बार भाजपा ने एनडीए की ही सरकार बनाई थी, लेकिन बहुमत रहने के कारण स्पीकर के लिए उसे किसी की मदद की जरूरत नहीं पड़ी। तीसरी बार कौन स्पीकर होगा, इसे लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। भाजपा इस बार लोकसभा में 242 सदस्यों के साथ बड़ी पार्टी बन कर उभरी जरूर है, लेकिन बहुमत के लिए एनडीए के घटक दलों पर उसकी निर्भरता बढ़ गई है।टीडीपी के नायडू मांग सकते हैं स्पीकर का पद कोई कह रहा है कि मोदी सरकार को समर्थन दे रही टीडीपी के नेता और आंध्र प्रदेश के सीएम अपना स्पीकर बनाना चाहते हैं तो कुछ को आशंका है कि सरकार को समर्थन दे रहे जेडीयू नेता कोई खेल कर सकते हैं। टीडीपी का कहना है कि स्पीकर का चयन सबकी सहमति से होगा। हालांकि नीतीश कुमार ने इसके लिए भाजपा के साथ रहने का फैसला किया है। टीडीपी के सर्वसम्मति वाले बयान से भाजपा की चिंता बढ़ गई है। लगातार दो दिनों से भाजपा मंथन कर रही है। सोमवार को पूर्व स्पीकर ओम बिड़ला के आवास पर गृह मंत्री अमित शाह ने उनसे चर्चा की तो राजनाथ सिंह ने भी इस बाबत पार्टी नेताओं के साथ बैठक की है।भाजपा जान चुकी है स्पीकर पद का महत्व भाजपा हर हाल में स्पीकर का पद अपने लिए रखना चाहेगी। इसके लिए पार्टी एनडीए के दूसरे घटक दलों को मना-समझा कर तैयार करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। भाजपा स्पीकर पद के महत्व को बेहतर समझती है। एक बार भाजपा को स्पीकर पद के महत्व का अनुभव हो चुका है। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार अगर 13 महीने में गिर गई तो इसके पीछे तत्कालीन स्पीकर की ही भूमिका थी। इसीलिए किसी भी हाल में भाजपा यह पद अपने पास ही रखने का प्रयास करेगी। स्पीकर की वजह से गिरी थी अटल सरकार वर्ष 1998 में भाजपा ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनाई थी। तमिलनाडु की तत्कालीन सीएम जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके ने वाजपेयी सरकार को समर्थन दिया था। 13 महीने बाद उन्होंने समर्थन वापस ले लिया। वाजपेयी को सदन में बहुमत साबित करने की नौबत आ गई। उन्होंने बहुमत के आंकड़े जुटा भी लिए थे। विश्वासमत के दौरान एक वोट से उनकी सरकार गिर गई। इसमें तत्कालीन स्पीकर जीएमसी बालयोगी की बड़ी भूमिका थी। जिस दिन लोकसभा में शक्ति परीक्षण होना था, उसमें एक सदस्य गिरिधर गोमांग ऐसे थे, जो कुछ समय पहले ही ओड़िशा के सीएम निर्वाचित हो चुके थे। हालांकि लोकसभा की सदस्यता से उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया था। स्पीकर बालयोगी ने उन्हें भी वोटिंग राइट दे दिया। उन्होंने वाजपेयी सरकार के खिलाफ वोट दे दिया। इस तरह वाजपेयी सरकार के पक्ष में 269 वोट पड़े तो विपक्ष में 270 वोट हो गए। वाजपेयी सरकार गिर गई। तब बालयोगी के उस फैसले की आलोचना भी खूब हुई थी, लेकिन तकनीकी आधार पर उन्हें दोषी नहीं ठहाराया जा सकता था। इसलिए भाजपा किसी भी हाल में स्पीकर पद पर भाजपा के ही किसी व्यक्ति को बिठाना चाहती है।तनातनी की स्थिति में ‘इंडिया’ करेगा खेल!विपक्षी दलों के गठबंधन ‘इंडिया’ ने स्पीकर के चुनाव में खेल करने की योजना बना रखी है। अगर एनडीए के घटक दल अपनी जिद पर अड़ जाते हैं तो विपक्षी गठबंधन भाजपा के खिलाफ उनकी मदद करने की तैयारी में है। विपक्षी गठबंधन को आशंका है बहुमत के लिए भाजपा उनके सदस्यों को तोड़ सकती है। ऐसे में स्पीकर की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। इसलिए विपक्षी पार्टियों के नेता भाजपा से किसी को स्पीकर बनाने का विरोध करेंगे। हालांकि यह भय एनडीए के घटक दलों को भी होगा ही। ऐसा सोचने का आधार खुद भाजपा ने ही खड़ा किया है। जेपी नड्डा कई बार कह चुके हैं कि क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। चूंकि भाजपा के पास इस बार बहुमत नहीं है, इसलिए वह तोड़-फोड़ के जरिए इसका प्रयास कर सकती है।