आर्सेनिक एक ऐसा कातिल कैमिकल जो सदियों से हत्यारों का रहा है सबसे पसंदीदा हथियार,

नई दिल्ली: मुंबई का सांताक्रुज मर्डर केस इन दिनों काफी चर्चा में हैं, जिसमें कारोबारी कमलकांत शाह की पत्नी और प्रेमी पर उनकी हत्या का आरोप है। कमलकांत के ब्लड में कई गुना ज्यादा आर्सेनिक और थैलियम पाया गया था। पुलिस को शक है कि कारोबारी की पत्नी उन्हें धीमा जहर दे रही थी। इस घटना के बाद धीमी गति से हत्या का हथियार आर्सेनिक एक बार फिर से चर्चा का विषय बन गया है।

मिस्ट्री मर्डर उपन्यास में हुआ आर्सेनिक का जिक्र

पुराने जमाने में राजा-महाराजा, उत्तराधिकारियों, राजनेताओं के भोजन में हत्या की साजिश में इस तरह के जहर के किस्से सामने आते थे। इसके अलावा आर्सेनिक को धीमे जहर की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है ये बात एक मर्डर मिस्ट्री उपन्यास से भी सामने आई। क्राइम फिक्शन क्वीन अगाथा क्रिस्टी पर आधारित उपन्यास ‘ए इज फॉर आर्सेनिक- द पॉइजन ऑफ अगाथा क्रिस्टी’ में एक नर्स ने आठ लोगों की ये कैमिकल देकर हत्या कर दी। ये उपन्यास मर्डर मिस्ट्री के लिए काफी मशहूर हुआ।

भारत में आर्सेनिक से हत्या के मामले

कमाल की बात ये है कि आर्सेनिक अपने शुद्ध रूप ग्रे-स्टील में ज्यादा जहरीला नहीं होता। लेकिन इसके एक यौगिक आर्सेनिक ऑक्साइड (सफेद आर्सेनिक) जहरीला होता है। इसे कई सदियों से हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। भारत में सफेद आर्सिनक जब चर्चा में आया जब एक क्लिनिक की मालकिन रतनबाई जैन ने वहां काम करने वाली तीन लड़कियों को धोखे से आर्सेनिक देकर मार दिया था। उसे शक था कि उन लड़कियों के उसके पति के साथ संबंध थे। कोर्ट ने इस मामले में रतनबाई को 1955 में फांसी की सजा सुनाई थी। रतनबाई आजाद भारत की पहली ऐसी महिला थी जिसे फांसी की सजा हुई थी।

आर्सेनिक बालों, नाखूनों या हड्डियों में पाया जा सकता है। टीओआई बॉम्बे की एक रिपोर्ट के अनुसार, 1935 में एक लाश में इसका पता चलने से पहली बार ये चर्चा में आया। पुलिस आर्सेनिक से हुई हत्याओं का अलग रिकॉर्ड रखती है। साल 1953 में मुंबई में इससे जुड़ा एक और मामला सामने आया था जब जब राघो शेट्टी नाम के एक पुलिस मुखबिर का शरीर चेंबूर के एक कुएं में पत्थर से बंधा मिला था। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से पता चला कि उसकी मौत आर्सेनिक के जहर से हुई थी। पुलिस पूछताछ में पता चला था कि एलेक्स डिसूजा नाम का एक मैकेनिक अक्सर शेट्टी से मिलने आता था और उसने अपनी झोपड़ी के पास लाश मिलने से कुछ दिन पहले एक कांच की फैक्ट्री से आर्सेनिक पाउडर खरीदा था। हत्या के आरोप में उनकी गिरफ्तारी के बाद, दोनों आरोपी डिसूजा और उनकी पत्नी मैरी को दोषी नहीं पाए जाने के बाद बरी कर दिया गया।

इसके बाद साल 1959 में अहमदनगर के एक डॉक्टर प्रभाकर हसबनीस ने अपनी पत्नी पद्मा की एलआईसी से 5,000 रुपये लेने के इरादे से हत्या कर दी। इसके अलावा उसने अपने रिश्तेदार मोरेश्वर कुलकर्णी को भी जहर देने का दोषी पाया गया था। जाली वसीयत दर्ज कराने के दो दिन बाद कुलकर्णी की संपत्ति हसबनीस को वसीयत में दे दी गई। टीओआई की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि हसबनीस ने यह कहा था कि उसकी पत्नी की मौत हार्ट अटैक से हुई थी और रिश्तेदार की मौत हैजा से हुई। नायर अस्पताल में फॉरेंसिक मेडिसिन एंड टॉक्सिकोलॉजी की पूर्व एचओडी डॉ. वसुधा आप्टे कहती हैं, “आर्सेनिक जहर देने के बाद व्यक्ति में हैजा के समान लक्षण दिखाई देते हैं।” हालांकि कोर्ट ने हसनबीस को दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई।

90 के दशक में ऐसा ही एक हैरान कर देने वाला मामला औरंगाबाद से सामने आया था जहां एक डॉक्टर ने अपनी पत्नी, बच्चों और खुद को मारने के इरादे से नमक में आर्सेनिक मिला दिया था, जिसका इस्तेमाल उनकी रसोई में खाना बनाने में किया जाता था। लेकिन उसकी डॉक्टर पत्नी को शुरुआती लक्षण दिखने पर कुछ गड़बड़ महसूस हुई। इसके बाद उन्होंने अपनी नौकरानी के खिलाफ पुलिस में शिकायत कराई। जब पुलिस ने जांच की तो उनके पति ने स्वीकार किया कि ये काम उन्होंने किया था, क्योंकि उनकी पत्नी उन पर शक करती थी।

फोरेंसिक जांच में लगाया जा सकता है पता

आर्सेनिक के गलत इस्तेमाल को देखते हुए फोरेंसिक उपकरण काफी एडवांस हो गए हैं। अब शरीर में आर्सेनिक की सटीक मात्रा का पता लगाया जा सकता है। कार्बनिक जहर और दवाओं के जानकर और एफएसएल अधिकारी कहते हैं कि अब आर्सेनिक को हत्या करने के लिए इस्तेमाल करने वाला बेस्ट हथियार नहीं माना जाता। महाराष्ट्र के फोरेंसिक एक्सपर्ट जिन हालिया मामलों को याद करते हैं, उनमें मैनेजमेंट की स्टूडेंट अदिति शर्मा और उसके प्रेमी प्रवीण खंडेलवाल का मामला शामिल है, जिन्हें 2008 में पुणे के जज द्वारा अदिति के एक्स बॉयफ्रेंड उदित भारती की हत्या के लिए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। अदिति ने अप्रैल 2007 में एक रेस्तरां में भारती को आर्सेनिक मिलाकर प्रसाद दिया था। जज ने कहा था कि प्रसाद के लिए कोई मना नहीं करता इसलिए आरोपियों के दिमाग में ये आइडिया आया। हालांकि बाद में बॉम्बे हाई कोर्ट ने अदिति और उसके पति को इस आधार पर जमानत दे दी कि उनके पास आर्सेनिक युक्त प्रसाद रखने के कोई सबूत नहीं मिले।