वन में अकेले फिर भी बना ली सेना, श्री राम की विदेश नीति करती है हैरान, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट

डॉ.ब्रह्मदीप अलूने/नई दिल्ली: विदेश नीतियों में मित्र संधि, दूतावास की स्थापना, तकनीकी सहयोग, सैन्य गठबंधन, शत्रु राष्ट्र के विद्वानों को शरण और सह अस्तित्व की प्रमुखता आधुनिक युग में रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। लेकिन सदियों पहले रामायणकाल में में यह कूटनीतिक चतुराई आज भी लोगों को हैरान कर देती है। दरअसल ये स्मृतियां रामायण काल से ही भारत में जीवंत रही है कि विदेश नीति में नैतिक मूल्य और मानवता की रक्षा समाहित होनी चाहिए। भारत के विदेशी संबंधों की प्रधानता में यही खासियत आज भी दिखाई देती है। आर्यवर्त की परिकल्पना में महान भारतवर्ष रहा है और इक्ष्वाकु वंश के श्रीराम ने दूसरे देशों से मित्रता और संधि के नये आयाम स्थापित करते हुए समुद्र को पार कर रावण के साम्राज्य को नष्ट करने में सफलता अर्जित की थी। आधुनिक विश्व में प्रथम विश्वयुद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध में मित्र सेनाओं के गठबंधन ने सफलतापूर्वक सेंट्रल पावर्स को पराजित किया था। रामायण काल में भौगोलिक स्थितियां बेहद जटिल थी। घने वनों से घिरे प्रदेश और आदिम जनजातियों का साम्राज्य। उत्तरप्रदेश के सरयू नदी के तट पर स्थित अयोध्या प्राचीन नगर है। इसकी गणना भारत की सात पवित्र नगरों में की जाती है। रामायण काल में यह कौशल की राजधानी के रूप में चर्चित रहा था। अयोध्या से लंका तक की पैदल यात्रा में श्री राम ने कई साम्राज्यों से बिना युद्ध किए, संधि की और यह उनकी विशिष्ट विदेश नीति से ही संभव हो सका था। श्री राम की वैदेशिक नीति में प्राचीन भारत की मित्र संधि की प्रमुखता देखी गई। भारत और सोवियत संघ की संधिइस संधि में दोनों राजा परस्पर मित्रता की घोषणा करते हैं कि एक दूसरे की मुसीबत में सहायता करना आवश्यक है। साढ़े पांच दशक पहले भारत और तत्कालीन सोवियत संघ की संधि भी इसी पर आधारित थी। अगस्त 1971 में शांति, मैत्री और सहयोग के भारत सोवियत संधि पर हस्ताक्षर किया जाना भारत की सुरक्षा के लिए प्रमुख मील का पत्थर साबित हुआ था। श्री राम दंडकारण्य, मलय पर्वत और चंदन वनों को पार करते हुए ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढ़े। यहां उन्होंने हनुमान और सुग्रीव से भेंट की। माता सीता के आभूषणों को देखा और श्री राम ने बाली का वध किया था।छोटे राज्यों को नहीं था संदेहश्री राम की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता यह थी की उन्हें छोटे राज्य कभी संदेह की दृष्टि ने नहीं देखते थे। स्वयं राम आर्यवृत्त जैसे महान साम्राज्य के संरक्षक होने के बाद भी सबसे बराबरी का व्यवहार करते थे। मित्र का शत्रु शत्रु होता है, इस नीति पर चलकर ही श्री राम ने किष्किंधा के राजा बाली का वध करके, यहां का शासक एक बार फिर सुग्रीव को बनाने में मदद की थी। पहले सुग्रीव ही किष्किंधा के राजा थे जिन्हें बलपूर्वक बाली ने हटा दिया था। पौराणिक भारतीय ग्रन्थों में विदेशी राज्यों से पणबंध संधि का भी उल्लेख मिलता है, जिसमें दोनों राजा कभी परस्पर युद्द न करने की घोषणा करते हैं और हमेशा शांतिपूर्वक रहने की प्रतिज्ञा करते हैं। लंका विजय के बाद विशाल सेना फिर अपने पूर्व स्वरूप में अपने अपने राज्यों के अधीन हो गई थीं। क्योंकि अयोध्या की राजसभा में राम राज्याभिषेक के पश्चात विभीषण व सुग्रीव आदि राजाओं के लंका और किष्किंधा आदि राज्यों को अयोध्या के अधीन करने के प्रस्ताव को श्री राम ने स्वयं ठुकरा दिया था। ऐसी रही श्रीराम की सेनाकोई भी शासक अपनी सैन्य सामर्थ्य के स्वरूप और उसकी क्षमता पर पूर्ण रूप से विचार किए बिना युद्ध नीति के लक्ष्यों का निर्धारण व उसकी पूर्ति नहीं कर सकता है। श्री राम की सेना मित्र सेनाओं की विविधता कुशल प्रबंधन और संगठन का परिणाम थी। इसे भी पौराणिक ग्रंथों में मित्र बल या आटविक बल के रूप में वर्णित किया गया है। आटविक बल जो जंगली जनजातियों की सेना का माना जाता था। श्री राम की सेना में विशाल वानर सेना, छोटे-छोटे राज्यों की छोटी-छोटी सेना और किष्किंधा, कोल, भील, रीछ और वनों में रहने वाले वानरों आदि का संयुक्त रूप थी। इसके पहले निषाद राज की नौसेना ने भी श्री राम के आगे बढ़ने में योगदान दिया था। जटायु मलयपुत्र प्रजाति के अधिपति थे और वे भी श्री राम के सहयोगी ही माने जाते हैं।दूतों और गुप्तचरों से भी अच्छा व्यवहारभारतीय सभ्यता और संस्कृति युगों-युगों से कितनी परिष्कृत रही है, यह प्रभु राम की विदेश नीति में दिखता है। भगवान राम के जन्म का काल त्रेता युग को माना जाता है। अर्थात रामायणकालीन इतिहास का संबंध लाखों वर्षों पहले से है। रीतिकाल के कवि है केशवदास, जिन्होंने रामचन्द्रिका लिखी है। जिसमें 16 वां अध्याय है अंगद रावण संवाद। इस अध्याय में दूत और वैदेशिक राजा को लेकर नियमों तथा कूटनीतिक संवाद की श्रेष्ठता को दर्शाया गया है। रामायण काल में दूतों और गुप्तचरों से कैसा व्यवहार होना चाहिए, इसके भी स्पष्ट संदेश है।लंका नरेश के दो विशेष गुप्तचर थे, शुक और शारण। शुक सबसे पहले सुग्रीव के पास रावण से मित्रता का प्रस्ताव लेकर आया था, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया था। बाद में शुक और शारण राम की सेना का भेद लेने वानर के रूप में आये और पकड़े गए तो राजा राम ने उन्हें दंड देने के स्थान पर मुक्त कर दिया था। उन्होंने इन विशेष गुप्तचरों पर उपकार कर लंका की जनता को यह संदेश दिया था की उनके राजा रावण अनीति के मार्ग पर हैं और इसका परिणाम लंका का विध्वंस होगा। श्री राम को इन गुप्तचरों ने उदार शत्रु कहा था। वहीं राम ने उनसे कहा, भेद जान लेना ही युद्ध जीतने का एक कारण नहीं होता बल्कि धर्म, नीति और सत्य ही यथार्थ शक्ति होती है।विदेशी संबंधों में समुद्री शक्ति को बढ़ाना प्राथमिकता माना जाता है। हिंद महासागर में भारत की मजबूत स्थिति के लिए क्वाड की अवधारणा इसी पर आधारित है। नभ और स्थल की विजय, सामुद्रिक शक्ति के उन्नत होने से सुनिश्चित मानी जाती है। मित्र देशों से कैसे तकनीकी सहयोग से आगे बढ़ा जा सकता है, उसी का परिणाम था रामेश्वरम से लंका को जोड़ने वाला पुल। सुग्रीव की सेना के नल और नील की बेहतरीन इंजीयरिंग का परिणाम था रामेश्वरम से लंका को जोड़ने वाला पुल। इसी के सहारे श्री राम की विशाल पैदल सेना समुद्र को पार करने में सफल हो सकी थी। नासा की ओर से समुद्र में खोजे गए रामसेतु से सहस्त्रों वर्षों पहले रामयण कालीन वैदेशिक और तकनीकी सहयोग की पुष्टि होती है।(लेखक डॉ.ब्रह्मदीप अलूने विदेशी मामलों के जानकार हैं।)