मप्र : महाकाल की सवारी पर ‘कुल्ला’ करने के मामले के बालिग आरोपी को जमानत मिली

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने नजदीकी धार्मिक नगरी उज्जैन में पिछले साल जुलाई के दौरान महाकाल की सवारी (शोभायात्रा) पर कथित रूप से ‘‘कुल्ला करने और थूकने’’ के बहुचर्चित मामले के इकलौते बालिग आरोपी को उसकी गिरफ्तारी के करीब पांच महीने बाद जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है।
अदालत ने मामले के शिकायतकर्ता और चश्मदीद गवाहों में शामिल एक व्यक्ति के पक्षद्रोही हो जाने और अन्य तथ्यों पर गौर करते हुए आरोपी की जमानत अर्जी मंजूर की।
उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के न्यायमूर्ति अनिल वर्मा ने अदनान मंसूरी (18) की जमानत याचिका मंजूर करते हुए कहा कि मामले की सुनवाई कर रही निचली अदालत के सामने शिकायतकर्ता सावन लोट और चश्मदीद गवाह अजय खत्री ने अभियोजन के दावों का समर्थन नहीं किया और वे पक्षद्रोही हो गए।
अदालत ने कहा कि पुलिस के जांचकर्ता अधिकारी ने आरोपी की शिनाख्त परेड भी नहीं कराई।
उच्च न्यायालय में बहस के दौरान मंसूरी की जमानत याचिका पर अभियोजन की ओर से आपत्ति जताते हुए कहा गया कि कथित घटना के सीसीटीवी फुटेज में आरोपी की पहचान हुई है और उसके खिलाफ सांप्रदायिक सद्भाव को नुकसान पहुंचाने के गंभीर आरोप हैं।
बचाव पक्ष के वकील देवेंद्र सिंह सेंगर ने बताया कि उच्च न्यायालय मामले में दो नाबालिग लड़कों की जमानत याचिकाएं पहले ही मंजूर कर चुका है।
पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि लोट ने मंसूरी और दो नाबालिग लड़कों पर यह आरोप लगाते हुए उज्जैन के खाराकुआं पुलिस थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई थी कि उन्होंने 17 जुलाई 2023 की शाम एक इमारत की छत पर खड़े होकर श्रावण माह के सोमवार पर निकाली जा रही महाकाल की सवारी पर पानी का कुल्ला किया था और थूका था।
उन्होंने बताया कि इस मामले में पुलिस ने भारतीय दंड विधान की 295-ए (किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के इरादे से जानबूझकर किए गए विद्वेषपूर्ण कार्य), धारा 153-ए (धर्म के आधार पर दो समूहों के बीच वैमनस्य फैलाना) और अन्य संबद्ध प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया था।
अधिकारी ने बताया कि गिरफ्तारी के बाद मंसूरी को न्यायिक हिरासत के तहत जेल भेज दिया गया था, जबकि दो नाबालिग लड़कों को बाल सुधार गृह भेजा गया था।
उन्होंने बताया कि घटना के दो दिन बाद 19 जुलाई 2023 को आरोपियों के परिवारों के मकानों के ‘‘अवैध’’ हिस्सों को ढहा दिया गया था।
‘एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स’ के कार्यकर्ता जैद पठान ने कहा कि मामले के शिकायतकर्ता और एक चश्मदीद गवाह के पक्षद्रोही हो जाने के बाद प्रशासन और पुलिस की कार्रवाई को लेकर जाहिर तौर पर गंभीर सवाल उठ गए हैं। उन्होंने मांग की कि आरोपियों के मकानों के हिस्सों को आनन-फानन में अवैध बताकर ढहाए जाने की जांच की जानी चाहिए और अगर प्रशासन का यह कदम गलत पाया जाता है, तो दोषी अफसरों को उचित सजा और पीड़ित परिवारों को सरकारी खजाने से मुआवजा दिया जाना चाहिए।