मध्य प्रदेश का एक ऐसा गांव जहां की महिला किसानों ने अपनाई पर्यावरण रक्षा और टिकाऊ खेती की राह

नीमखेड़ा गांव बाहरी तौर पर तो निवाड़ी जिले और प्रखंड (मध्य प्रदेश) का एक साधारण सा गांव है, पर यहां की अनेक महिला किसानों ने आत्म-निर्भरता की ओर बढ़ने और इसे पर्यावरण रक्षा से जोड़ने की जो राह अपनाई है, वह असाधारण है और उससे बेहतर, टिकाऊ विकास की बहुत संभावनाएं निकलती हैं। यह महिलाएं हैं तो छोटे किसान परिवारों की, मात्र कुछ बीघे की खेती करती हैं, पर उनकी उपलब्धि छोटी नहीं है, बड़ी है।इन प्रयासों की शुरुआत लगभग तीन-चार वर्ष पहले हुई जब सृजन संस्था ने जल-संरक्षण और प्राकृतिक खेती के मिले-जुले कार्यक्रम के लिए गांववासियों का सहयोग प्राप्त किया। इस कार्यक्रम में महिलाओं को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया। जब यह महिलाएं संगठित होकर नियमित तौर पर मीटिंग करने लगी और आपसी विमर्श से अपने भविष्य को संवारने के निर्णय लेने लगी तो गांव में सार्थक बदलाव की एक बड़ी पहल हुई। जड़ता टूटी और रचनात्मकता के नए अवसर उत्पन्न होने लगे।आपसी विमर्श और ‘सृजन’ के सहयोग से तालाब से वर्षों से जमा मिट्टी निकाली गई और इसे अपने खेतों में डालकर किसानों ने अपनी मिट्टी के प्राकृतिक उपजाऊपन को बढ़ाया। इस तरह गांव के चंदेल कालीन तालाब की जल-संग्रहण क्षमता में उल्लेखनीय क्षति हुई, उसमें 12 महीने पानी रहने लगा। इसके साथ बरसाती पानी के लगभग 15 नियोजित गड्डे या ‘दोहे’ बनवाए गए जिनमें वर्षा का पानी रुक सके। इस तरह प्रत्यक्ष सिंचाई के साथ पानी का रिचार्ज बढ़ा, कंओँ और हैंडपंप में जल-स्तर बढ़ा। मनुष्यों और पशु-पक्षियों का जल-संकट कम हुआ। मेढ़बंदी और वृक्षारोपण से भी जल-संरक्षण की सहायता मिली। ‘तपोवन’ नाम से वैज्ञानिक पद्धति से मंदिर के पास विभिन्न स्थानीय प्रजातियों के वृक्षों का उद्यान तैयार किया गया। इसमें उपजाऊ मिट्टी तैयार करने के बाद वृक्षारोपण होने से व अन्य उपायों से यह सुनिश्चित किया गया है कि वृक्ष बेहतर ढंग से बढ़ सकें।प्राकृतिक खेती के प्रशिक्षण आयोजित किए गए। रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं को छोड़ कर गोमूत्र और गोबर से तैयार खाद और फसल-रक्षा के छिड़काव को प्रोत्साहित किया गया। अब यहां के अनेक किसानों ने इस बदलाव को अपनी पूर्ण या आंशिक भूमि पर अपना लिया है जबकि अनेक अन्य किसान इस ओर बढ़ रहे हैं। रामकुंवर ने प्राकृतिक कृषि केन्द्र की स्थापना की। यहां से वे किसान गोमूत्र और गोबर की खाद प्राप्त कर सकते हैं जिनके पास इसकी कमी है। गोबर और गोमूत्र का बेहतर और वैज्ञानिक उपयोग करने का प्रशिक्षण दिया जाता है जिससे इनके कम मात्रा में उपयोग से भी बेहतर पोषण भूमि को प्राप्त हो सके और हानिकारक कीड़ों, बीमारियों से फसल का बेहतर उपचार हो सके।सब्जियों के बेहतर उत्पादन के लिए बहुस्तरीय खेतों को अपनाया गया। गिरिजा देवी ने बताया कि सब्जियों का उत्पादन तो पहले भी करते थे, पर अब यह पहले से कहीं बेहतर और वैज्ञानिक ढंग से किया जाता है। जड़ की फसलों, ऊपर व नीचे की बेलों, बड़े और छोटे पौधों, अधिक धूप या अधिक छाया चाहने वाले पौधों से मिश्रित खेती इस तरह की जाती है कि वे एक-दूसरे के पूरक, सहायक व रक्षक बन सकें। इसके लिए वाटिका में बांस लगाए जाते हैं, तारें टांगी जाती हैं। इस तरह जिस सब्जी को धूप चाहिए वे ऊपर पहुंच जाती है, जिसे छाया चाहिए उसे पेड़ों की छाया मिल जाती है।फलों जैसे अमरूद, पपीते, नींबू, आम आदि के छोटे बगीचे भी लगाए गए हैं, जो कुछ समय बाद फल देने लगेंगे। किचन गार्डन घर के पास ही लगाए गए हैं जिनमें सब्जियों का उत्पादन घरेलू उपयोग की जरूरत के आधार पर किया जाता है। गांव में जगह-जगह खेती के प्रदर्शन प्लाट नजर आते हैं जहां प्राकृतिक खेती की सफलता नजर आती है व मिश्रित खेती भी देखी जा सकती है।सृजन की कार्यकर्ता ममता ने बताया – कुछ किसानों ने प्राकृतिक खेतों को अधिक पूर्णता से अपनाया है जो यहां के लीड या अग्रणी पंक्ति के प्राकृतिक पद्धति के कृषक माने गए हैं। उनकी सफलता को देखकर अन्य किसान पूर्ण या आंशिक तौर पर प्राकृतिक खेती से जुड़े रहे हैं और यह प्रक्रिया निरंतर आगे बढ़ रही है। जल-संरक्षण और खेतों में तालाब की मिट्टी पहुंचने से इस काम में बहुत सहायता मिली है।गायत्री ने बताया कि जल-संरक्षण, तालाब की मिट्टी और प्राकृतिक खेती का मिला-जुला असर यह है कि कुछ खेतों का उत्पादन दो गुना हो गया है। जहां उत्पादन वृद्धि अधिक नहीं बढ़ी, वहां भी खर्च तो बहुत कम हुआ ही है। बुजुर्ग महिलाओं ने बताया कि पहले कोदो, चीना, सावा आदि मोटे अनाज (मिलेट) होते थे, जो बिना सिंचाई के ही उत्पन्न हो जाते थे और पौष्टिक भी थे। उन्होंने कहा इन फसलों को भी वापस लाना चाहिए।लगभग सभी महिलाओं ने कहा कि स्वास्थ्य और स्वाद की दृष्टि से प्राकृतिक खेती के उत्पाद बेहतर हैं। प्राकृतिक खेती करने से मिट्टी की गुणवत्ता सुधर रही है, वह अधिक भुरभुरी हो रही है, उसमें नमी देर तक बनी रहती है।प्राकृतिक खेती और जल-संरक्षण के लिए जब महिलाएं मीटिंग में विमर्श करती हैं तो गांव की अन्य समस्याओं को सुलझाने में भी मदद मिलती है। इस तरह कई तरह की सामूहिक सक्रियता के साथ यह महिलाएं आत्म-निर्भरता, बेहतर कृषि, जल-संरक्षण और स्वास्थ्य की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।नीमखेड़ा गांव के अतिरिक्त निवाड़ी जिले के अनेक अन्य गावों में भी महिला किसानों ने महत्त्वपूर्ण उपलब्धियां प्राप्त की हैं। पृथ्वीपुर प्रखंड के गुलेंदा गांव में तालाब की न केवल सफाई की गई, उसकी मरम्मत और सुधार कार्य भी हुए। यहां से बरसाती नाले में बनाए दोहों से भी बहुत अच्छे परिणाम मिले हैं। पानी और रिचार्ज बढ़ा है और कुंओं की स्थिति सुधरी है। एक कुंए की मरम्मत से भी जल उपलब्धता बेहतर हुई है। इसका असर प्राकृतिक खेती की बेहतर उपलब्धि में भी दिख रहा है और बहु-स्तरीय सब्जी उत्पादन भी प्राकृतिक पद्धति से तेजी से बढ़ा है। इन सुधारों से पलायन की मजबूरी भी कम हो रही है जबकि कम उपजाऊ मिट्टी के इस ग्राम में पहले पलायन और प्रवास बहुत होता था।यहां और निवाड़ी ब्लाक के बहेड़ा गांव में महिला किसानों के आपसी विमर्श से जो विकास कार्यों का चयन हुआ, उसके बहुत उपयोगी परिणाम मिले हैं। इन दोनों गांवों में प्राकृतिक कृषि केन्द्रों की भी स्थापना की गई है। बहेड़ा में नाले पर बने 22 दोहे विशेष सफल रहे हैं और इसके असर से न केवल इस गांव का जल-स्तर सुधरा है अपितु इसका लाभ पड़ौसी निमचौजी गांव तक भी पहुंचा है।यह प्रयास ‘बिवाल’ नामक बुंदेलखंड क्षेत्र के एक जल संरक्षण और प्राकृतिक खेती के व्यापक प्रयास का हिस्सा है जो बुंदेलखंड क्षेत्र (उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 14 जिले) में एक नई उम्मीद जगा रहा है। इस व्यापक प्रयास में निवाड़ी जिले के कुछ गांवों के लिए आर्थिक सहयोग इण्डस इंड बैंक से प्राप्त हुआ है।