325 सालों का आक्रोश, मंदिर- मस्जिद को लेकर अयोध्या हुई लाल… वह पहला सांप्रदायिक दंगा

अयोध्या: मैं अयोध्या हूं। वह अयोध्या, जिसने 500 सालों में कई राजाओं और उसके शासन को देखा। मस्जिद का निर्माण देखा। मंदिर को बिखड़ते देखा। वर्ष 1528 में जब मुग़ल सम्राट बाबर के सेनापति मीरबाकी तासकंदी ने मस्जिद बनवाई तो हिंदुओं की भावना आहत हुई। विभिन्न वर्गों में बंटा कमजोर हिंदू वर्ग अपनी आवाज बुलंद कर पाने में सक्षम नहीं था। बड़ी संख्या में लोग अपने आराध्य के नाम पर कट गए, लेकिन प्रभु रामलला के मंदिर को बचा पाने में कामयाब नहीं हो पाए। गोस्वामी तुलसीदास ने भी अपनी पुस्तक तुलसी दोहा शतक में इस घटना का जिक्र किया है। बाद के दिनों में भगवान श्रीराम की जन्मभूमि पर मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाए जाने के मामले में तूल पकड़ना शुरू किया। मुगल शासन समाप्त हो चुका था। अंग्रेजी हुकूमत हिंदुस्तान में पैर पसार चुकी थी। इसी दौरान हिंदुओं की भावना भी जोर पकड़ना शुरू किया। हिंदू वर्ग बार- बार मस्जिद वाले स्थान पर भगवान श्रीराम की जन्मभूमि होने का दावा कर रहा था। कई बार इस मामले को स्थानीय शासन और हिंदू वर्ग आमने-सामने आए। हिंदू अपने आराध्य के जन्मस्थल पर पूजा की अनुमति मांग रहे थे। मैं मूक बैठी इन तमाम घटनाओं की साक्षी बनती रही।तनाव में बीती तीन शताब्दी, फिर फूटा आक्रोशप्रभु रामलला की मंदिर को नष्ट किए तीन शताब्दियों से अधिक का दौर गुजर चुका था। यह काल 1850 के आसपास का था। अयोध्या अवध रियासत का हिस्सा थी। नवाब वाजिद अली शाह यहां पर शासन कर रहे थे। इसी दौरान निर्मोही पंथ के लोगों ने मंदिर तोड़कर बाबर के मस्जिद बनाए जाने के मामले को उठाना शुरू किया। निर्मोही पंथ वापस अपने मंदिर को पाने की लड़ाई लड़ रहा था। मुगल बादशाह के खिलाफ उन्होंने गंभीर आरोप लगाकर हिंदू समाज को एकजुट करना शुरू किया। हिंदू समाज के निर्मोही पंथ के साधुओं के दावों पर मुस्लिम समाज की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की जाने लगी। हिंदू वर्ग के मंदिर के दावों पर मुस्लिम समाज ने मस्जिद के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ न होने देने का दावा करता रहा। देखते ही देखते राम जन्मभूमि का मुद्दा मंदिर- मस्जिद का मुद्दा बन गया। दो संप्रदायों के बीच विवाद की जड़ में यह समा गया। नवाब नहीं निकाल पाए कोई समाधानमंदिर- मस्जिद के मुद्दे को लेकर दो संप्रदायों की भवना टकराने लगी। नवाब वाजिद अली शाह तक मामला पहुंचा, लेकिन उनके स्तर पर विवाद का कोई समाधान नहीं निकाला जा सका। मंदिर विध्वंस का 325वां वर्ष आते- आते हिंदू वर्ग काफी आक्रोशित हो चुका था। वह हर हाल में अपने मंदिर को वापस पाना चाहता था। मंदिर- मस्जिद के मसले दोनों समुदाय दो पाटों में बंट चुके था। निर्मोही पंथ हर हाल में मस्जिद तोड़कर श्रीराम जन्मभूमि पर हर हाल में मंदिर के निर्माण करा देना चाहता था। वहीं, मुस्लिम समुदाय वहां पर राम जन्मभूमि नहीं होने का दावा करता रहा। ऐसे में प्रभु राम की नगरी अयोध्या में पहली बार दो समुदायों के बीच जंग जैसी स्थिति बनी। मेरी धरती पर पहली बार राम के नाम पर संग्राम छिड़ा। दोनों समुदायों के लोग आपस में भिड़ गए। बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। नवाब वाजिद अली शाह की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1855 में 12 हजार हिंदुओं ने बाबरी मस्जिद को घेर लिया था। मुस्लिम समाज के लोग बाबरी को बचाने गए। खूनी संघर्ष हुआ। इसमें 70 मुसलमान मारे गए थे। अंग्रेजी शासन ने इस सांप्रदायिक दंगे की आड़ में अवध पर अपना प्रभाव जमा लिया। सांप्रदायिक दंगे को दमन के जरिए शांत कराया गया।पांच सालों तक चला विवादअयोध्या राम जन्मभूमि को लेकर 1853 के पहले दंगे की शुरुआत के बाद पांच सालों तक अयोध्या सुलगती रही। साधुओं का एक बड़ा वर्ग इस आंदोलन का नेतृत्व करता रहा। लेकिन, नवाब की फौज और अंग्रेजी हुकूमत की क्रूरता के आगे उनकी नहीं चली। लेकिन, निर्मोही पंथ किसी भी स्थिति में राम जन्मभूमि पर दावा छोड़ने को तैयार नहीं था। उनका आंदोलन लगातार जारी रहा। आखिरकार, अंग्रेजी सरकार ने मंदिर- मस्जिद विवाद पर वर्ष 1859 में बड़ा निर्णय लिया। मेरे प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि पर पहली बार तार के बार लगवा दिए गए। जन्मभूमि को दो हिस्सों में बांट दिया गया। मस्जिद के भीतर का हिस्सा मुस्लिमों को दिया गया। वहीं, बाहरी हिस्से में हिंदुओं को पूजा का अधिकार दिया गया। हालांकि, हिंदू साधु लगातार बाबरी मस्जिद के मुख्य गुंबद के नीचे प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि होने का दावा करते रहे। मैं इसकी गवाह हूं। लेकिन, मेरी गवाही उस मंच पर नहीं हो सकती थी। मैं चुपचाप बस देखती रही।1934 में तोड़े गए थे मस्जिद के तीनों गुंबद1853 से 1859 के बीच 1857 का दौर भी आया। पहली बार अंग्रेजी सरकार के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंका गया था। गोलियों में गौवंश और सुअर की चर्बी के इस्तेमाल के मसले पर सिपाहियों ने बंदूकों के इस्तेमाल से इनकार किया। इस पर विवाद गहरा गया। हालांकि, अंग्रेजी सरकार ने पहले सिपाही विद्रोह को कुचला। इसके बाद सांप्रदायिक विवाद की जड़ बनते मंदिर- मस्जिद मुद्दे को बंटवारे के जरिए सुलझाने की कोशिश की। लेकिन, हिंदुओं को यह कहां मंजूर था। वे तो अपने आराध्य की जगह को वापस पाने को किसी भी स्थिति में जाने को तैयार दिख रहे थे। देश में आजादी की लड़ाई शुरू हो गई थी। मुगलकालीन गुलामी के प्रतीक बाबरी मस्जिद से भी आजादी के नारे बुलंद होने लगे। 20वीं सदी की शुरुआत हो चुकी थी। हिंदुओं को आधार बनाकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मुस्लिम लीग का गठन हो चुका था। अंग्रेज बांटो और राज करो की नीति के तहत दोनों समुदायों की खाई को गहरी करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। विवादित मुद्दों को हवा देकर आजादी की लड़ाई की राह को भी भटकाने की कोशिश हो रही थी। लेकिन, आस्था के मसले पर कोई भी पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं था। 1934 आते- आते एक बार फिर हिंदुओं का आक्रोश चरम पर था। 1934 में हिंदुओं की भीड़ बाबरी मस्जिद तक पहुंची। विवादित ढांचे को घेर लिया गया। इस बार अंग्रेजी हुकूमत का कोई जोर नहीं चला। हिंदुओं ने बाबरी मस्जिद के तीनों गुंबद तोड़ दिए। इसके बाद हिंदुओं को बल का प्रयोग करते हुए खदेड़ा गया। हालांकि, बाद में फैजाबाद डीएम ने बाबरी के तीनों गुंबदों का पुननिर्माण कराया। इस घटना ने हिंदुओं को एक प्रकार से जोड़ा। मंदिर- मस्जिद का आंदोलन घर- घर तक पहुंचा। हालांकि, इसके बाद आजादी की जंग ने धर्म के इस मुद्दे को कुछ वर्षों के लिए शांत कर दिया।