26/11 आपबीती: उस मनहूस रात के बाद पैरों पर नहीं चल सके मेरे पति…न नौकरी मिली न मुआवजा

मुंबई: 26 नवंबर 2008 कि वह मनहूस रात आज भी बेबी श्यामसुंदर चौधरी के जहन में ताजा है। अपनी जिंदगी में वे उस रात को किसी अमावस की रात की तरह मानती हैं जिसकी वजह से आज उनका पूरा जीवन दुख और परेशानियों से भरा हुआ है। उस रात बेबी चौधरी के पति श्यामसुंदर चौधरी रोज की तरह नाइट ड्यूटी के लिए अंधेरी पूर्व स्थित घर से निकले थे। श्यामसुंदर चौधरी विले पार्ले में मौजूद पारले जी कंपनी में काम करते थे। लेकिन उस रात सेंटूर के पास हुए ब्लास्ट में वह बुरी तरह से जख्मी हो गए। उस रात के बाद से आज तक वे कभी अपने पैरों पर चल नहीं सके, बोल नहीं सके। एक तरह से उनका पूरा शरीर लकवा ग्रस्त है। सिर्फ आंखों से इशारा करके वह अपनी बात कह पाते हैं। पाकिस्तान से आये आतंकियों ने एक टैक्सी में टाइमर बम प्लांट कर दिया था जो मुंबई के विले पार्ले इलाके में ब्लास्ट हुआ था। जिसमें ड्राइवर समेत मासूम यात्री मारे गए थे। मुंबई के कूपर अस्पताल में इलाज हुआ लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

हमले के बाद बदल गई जिंदगीमुंबई आतंकी हमले कि उस रात के पहले तक बेबी चौधरी का परिवार हंसी खुशी से अपना जीवन गुजार रहा था। परिवार में पति श्यामसुंदर चौधरी, पत्नी बेबी चौधरी, एक बेटा और एक बेटी समेत सास-ससुर और ननद हर कोई था। कम पैसों में ही सही। लेकिन गुजारा हो रहा था। परिवार बहुत खुश था। उस एक हादसे ने पूरे परिवार की किस्मत को पलट कर रख दिया। जब यह हादसा हुआ तब बेबी चौधरी का एक बच्चा चार साल का था जबकि एक बेटी 8 साल की थी। ऐसे में परिवार की पूरी जिम्मेदारी बेबी चौधरी के कंधों पर आ गई। बारहवीं तक पढ़ी बेबी चौधरी को अब नौकरी की तलाश थी। लेकिन नौकरी कर पाना भी इतना आसान नहीं था। घर में पति की देखभाल करना, बच्चों के लिए खाना पकाना और सास ससुर की सेवा या उनकी जरूरत को पूरा करना भी बेबी चौधरी के ही जिम्मे था। परिवार चलाने के लिए उन्होंने एक सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी भी की।

वादे पूरे नहीं हुए… नवभारत टाइम्स ऑनलाइन से बातचीत में बेबी चौधरी ने बताया कि हादसे के बाद पति का मुंबई के कूपर हॉस्पिटल में इलाज हुआ। लेकिन वह उस हादसे के बाद से कभी अपने पैरों पर खड़े नहीं हो सके। राज्य सरकार ने मुआवजे के नाम पर 50 हजार रुपए दिए जबकि केंद्र सरकार की तरफ से एक लाख का मुआवजा मिला। वहीं, स्थानीय विधायक कृष्णा हेगड़े ने अपनी एक महीने की तनख्वाह हमारे परिवार को दी। इससे ज्यादा सरकार की तरफ से हमें कोई राहत नहीं मिली। बेबी बताती हैं कि सरकार ने उन्हें नौकरी देने का वादा किया था। लेकिन हादसे के 15 साल गुजर जाने के बाद भी आज तक न तो उन्हें और न उनके परिवार में से किसी को नौकरी दी गई है। टाटा वेलफेयर ट्रस्ट की तरफ से उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का खर्च उठाया जाता है। अब उनका बेटा नौकरी करने लगा है।

हालांकि साल 2015 से लेकर साल 2020 तक बेबी चौधरी ने परिवार चलाने के लिए सिक्योरिटी गार्ड का भी काम किया था। लेकिन लॉकडाउन लगने के बाद वह नौकरी भी उनके हाथ से चली गई। जिसके बाद उनकी मुश्किलें और भी बढ़ गईं। बेबी बताती हैं कि अगर टाटा वेलफेयर ट्रस्ट न होता तो शायद आज वह दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर होती। उनके बच्चे पिता की मौजूदगी के बावजूद अनाथ की तरह रहते। उनकी पढ़ाई लिखाई करवा पाना भी मेरे लिए संभव नहीं हो पाता। इसलिए सरकार से ज्यादा मैं रतन टाटा और उनके ट्रस्ट की शुक्रगुजार हूं।

फडणवीस ने भी वादा नहीं पूरा कियाबेबी चौधरी ने बताया कि इसके पहले जब महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री थे तब मैं उनसे काला घोड़ा इलाके में मिली थी। उन्होंने मुझे सरकारी नौकरी देने का वादा किया था। लेकिन बाद में मुझे यह कहा गया कि मेरी पढ़ाई सिर्फ बारहवीं तक हुई है इसलिए सरकारी नौकरी दे पाना मुश्किल है। बाद में मुझे यह आश्वासन दिया गया कि मेरी ननद को नौकरी दी जाएगी। हालांकि उसे भी नौकरी न देते हुए यह कहा गया कि शादी के बाद वह कहीं और चली जाएगी। ऐसे में आपके परिवार का गुजर-बसर कैसे होगा? फिर यह कहा गया कि जब बेटा नौकरी के काबिल हो जाएगा तब उसे जॉब दे दी जाएगी। आज बेटा नौकरी के काबिल हो गया है, इसलिए उसे नौकरी देकर सरकार अपना वादा पूरा करे।

स्थानिय विधायक ने काफी मदद की थीबेबी चौधरी ने बताया कि हादसे के बाद स्थानीय तत्कालीन स्थानीय विधायक कृष्णा हेगड़े ने उनके परिवार की काफी मदद की। जब तक वह विधायक रहे तब तक हमारे घर का राशन वह भरवा थे थे लेकिन चुनाव न जीत पाने की वजह से उनके द्वारा मिलने वाली मदद भी धीरे-धीरे खत्म होती चली गई। कृष्णा हेगड़े ने एक बड़े भाई की तरह हमारे परिवार की देखभाल की थी।